पता नहीं देश कैसे चल रहा है?
विनोद कुमार सिंह से सुनिए। हाल-ए-बनारस। बताते हैं कि दो सप्ताह पहले उन्होंने साधारण बस से बेटे के साथ गांव जाने के लिए 30 किमी की दूरी तय करने के लिए 35 रुपया किराया दिया था। विनोद कुमार सिंह बनारस में वकील हैं। उन्हें गांव से लौटने के बाद पता चला कि अधिकांश परदेसी (दिल्ली, मुंबई के औद्योगिक शहरों में रोजी-रोटी कमाने वाले) गांव में ही घूम रहे हैं। जानकारी लेने पर पता चला कि कुछ तो कोरोना की पहली लहर में आए थे। कुछ दूसरी लहर में आए और काफी समय से गांव में ही रह रहे हैं। कुछ परदेसी आए थे और बाद में कामकाज, रोजी-रोटी के लिए महानगरों की तरफ लौट गए, लेकिन उनका काम धंधा अभी भी सेट नहीं हो पाया है। इसलिए उन लोगों ने गांव से अपने भाइयों या अन्य को अभी गांव में ही रहने की सलाह दी है। वह बताते हैं कि इस तरह से उनके गांव की आमदनी कम हो गई और गांव पर खेती-खलिहानी, खाद-यूरिया, पेट्रोल-डीजल, मंहगाई की मार तथा परदेसियों की संख्या से मंहगाई की मार ठीक-ठाक पड़ रही है।
दिल्ली में भी मंहगाई की मार
दिल्ली के मधुविहार में तेजिंदर छाबड़ा और विकास मार्ग, लक्ष्मीनगर में राजकुमार की गिफ्ट शॉप है। वह कहते हैं कि पिछले दो साल से दिल्ली वाले गिफ्ट लेना ही भूल गए हैं। पहले छाबड़ा की दुकान पर दो लड़के काम करते थे। राजकुमार की दुकान पर तीन लड़के थे। अब छाबड़ा के साथ उनकी पत्नी हाथ बंटा रही है। जबकि राजकुमार अब एक नौकर और पत्नी के साथ दुकान चला रहे हैं। दोनों का कहना है कि इसके बाद भी किसी तरह से खर्चा निकल पा रहा है। लक्ष्मीनगर से सटे शकरपुर मेन मार्केट में भारत ज्वेलर्स है। इसके प्रोपाइटर अश्विनी बग्गा अपने बेटे गौरव बग्गा के साथ कारोबार संभालते हैं। बग्गा का कहना है कि लोग अभी खाने-पीने का खर्च निकालने के जुगाड़ में लगे हैं। ऐसे में अभी सोना-चांदी कौन खरीदने आ रहा है? दिल्ली रेडीमेड गारमेंट का बड़ा बाजार है। यहां के गांधी नगर मार्केट में काफी रौनक रहा करती थी, लेकिन कपड़े के कारोबार से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि पहले की तुलना में केवल 30-40 फीसदी कारोबार ही हो पा रहा है। रोशन कहते हैं कि पहले उनके पास काफी कारीगर और कामगार थे। लेकिन इस समय एक तिहाई लोगों से ही काम-धंधा चल रहा है। रोशन बताते हैं कि अभी बाहर से ऑर्डर भी कम मिल रहे हैं और कारोबारी भी बाजार का रुख नहीं कर पा रहे हैं।
आइए उद्योगों की तरफ चलते हैं
एनबीसीसी देश की बड़ी अवसंरचना निर्माण से जुड़ी नवरत्न इकाई में है। एनबीसीसी सीएमडी के सचिवालय का कहना है कि कोरोना काल ने काफी परेशानी बढ़ाई। तमाम परियोजनाओं की लागत बढ़ गई है। करीब 8000-9000 मजदूरों को लंबे समय तक बिठाकर मजदूरी, खाना-पीना सब देना पड़ा। अब पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम ने बेहाल कर रखा है। ग्रेटर नोएडा में अंजनी टेक्नोप्लास्ट लिमिटेड है। कंपनी के सीएमडी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानें तो अभी भी नियमित नहीं हो पाई हैं। यही स्थिति घरेलू उड़ानू की भी है। रेल की हालत देख रहे हैं। ऊपर से पेट्रोल-डीजल का रेट लगातार बढऩे से हर तरह का खर्च बढ़ रहा है। रिअल एस्टेट के कारोबार से जुड़े अंतरिक्ष इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के सीएमडी राकेश यादव का कहना है कि कारोबार अब कहां रह गया। अब तो बस दिखावे की चमक रह गई है। अभी इस धंधे में आ गए हैं तो कुछ न कुछ तो करते रहना है। कुछ ऐसी ही बात एनआरजी इंजीनियरिंग के सीएमडी भी कहते हैं कि स्थिति काफी मुश्किल है। वह बताते हैं कि 2020 में कोरोना की पहली लहर के बाद से उन्होंने एक भी नए आदमी को नौकरी नहीं दी है। हां, कंपनी चलाते रहने के लिए दूसरे खर्चे जरूर कम करने पड़े।
सरकार को एमएसएमई का हाल पूछ लेना चाहिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई महीने में केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार किया था। नए मंत्री के रूप में नारायण राणे को सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों (एमएसएमई) का प्रभार मिला। लेकिन खुद उनके मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि एमएसएमई को पटरी पर लौटने में समय लगेगा। एमएसएमई मंत्रालय के एक निदेशक का कहना है कि सबसे अधिक रोजगार देने वाले इस सेक्टर को मंहगाई, पेट्रोलियम पदार्थों के दामों ने तंग कर रखा है। सुनील गोयल की दिल्ली के बवाना औद्योगिक क्षेत्र में छोटी सी पैकेजिंग से जुड़ी कंपनी है। वह कहते हैं कि जल्द से जल्द सब ठीक हो जाए तो ऊपर वाले मालिक की दुआ समझिए। गोयल लंबी सांस लेते हुए कहते हैं कि मुझे नहीं पता नीचे वाला 'मालिक' (देश की सरकार और नेता) क्या कर रहे हैं, लेकिन ऊपर वाला कुछ न कुछ जरूर करेगा। इसी उम्मीद में हम रोज काम पर जा रहे हैं।