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नया संसद भवन: सबसे बड़े लोकतंत्र काे आधुनिक पहचान, वह खास दिन, आजादी से ठीक पहले वाले दिन का पूरा ब्योरा

Sat, 27 May 2023 07:00 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि संसद लोकतंत्र का मंदिर है। विपक्ष की तरफ से इसका विरोध बेवजह किया जा रहा है। इसे लेकर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। जब मैं अध्यक्ष थी, तो वही लोग जो आज इसका विरोध कर रहे हैं, अक्सर संसद भवन में बैठने की दिक्कत, जगह की दिक्कत जैसी शिकायतें करते थे।
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नया संसद भवन। - फोटो : PTI
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विस्तार
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कांग्रेस भले ही आज यह दावा कर रही हो कि राजदंड सेंगोल का सत्ता हस्तांतरण से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन आजादी से ठीक पहले वाले दिन क्या-क्या हुआ इसका लिखित ब्योरा आज भी मौजूद है। आजादी के तुरंत बाद टाइम पत्रिका ने 25 अगस्त, 1947 को एक आलेख प्रकाशित किया जिसमें इस बारे में विस्तार से बताया गया था। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने कांग्रेस के आरोपों के जवाब में यह आलेख ट्विटर पर साझा किया है।

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इसमें लिखा गया है : 'जैसे ही ऐतिहासिक दिन करीब आया, भारतीयों ने अपने ईश्वर को धन्यवाद देना शुरू किया और पूजा, प्रार्थना, भजन आदि सुनाई देने लगे। सरोजिनी नायडु ने रेडियो संदेश का थीम गीत तय किया...। 

क्या हुआ था 14 अगस्त के दिन
भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने से एक दिन पहले जवाहरलाल नेहरू जैसे अनीश्वरवादी भी धार्मिक उत्साह में थे। दक्षिण भारत में तंजौर से हिंदू संन्यासी अंबलवाण देसिगर स्वामी के दो प्रतिनिधि आए थे।अंबलवाण ने सोचा कि प्राचीन भारतीय राजाओं की तरह, वास्तविक भारत सरकार के पहले भारतीय प्रमुख के रूप में नेहरू को पवित्र हिंदुओं से सत्ता का प्रतीक और अथॉरिटी हासिल करनी चाहिए। इन प्रतिनिधियों के साथ वाद्य यंत्र नागस्वरम को बजाने वाले भी आए थे। दूसरे संन्यासियों की तरह इन दोनों पुजारियों के बाल बड़े थे और बालों में कंघी नहीं की गई थी और इसे जटा की तरह गोल बांधा गया था। उनकी खुली छाती पर अंबलवाण स्वामी के आशीर्वाद के रूप में पवित्र भस्म मली हुई थी।

  • एक पुराने घाट से 14 अगस्त की शाम को वे धीरे-धीरे नेहरू के घर की तरफ बढ़े। उनके आगे-आगे नागस्वरम बजाने वाले चल रहे थे। ये हर 100 मीटर के बाद रुककर सड़क किनारे करीब 15 मिनट तक नागस्वरम बजाते थे। एक व्यक्ति एक बड़ी सी थाल लेकर चल रहा था, जिस पर पीतांबर रखा था। जब वह नेहरू के घर के बाहर पहुंचे तो नागस्वरम बजाने वाले इसे बजाते रहे, जबकि दोनों पुजारी नेहरू के आमंत्रण का इंतजार करते रहे।
  • दोनों पुजारियों ने पूरे सम्मान के साथ घर में प्रवेश किया। दो युवा उन्हें बड़े पंखे झल रहे थे। एक संन्यासी ने पांच फीट लंबा सोने का राजदंड लिया हुआ था। इसकी मोटाई 2 इंच थी। उन्होंने तंजौर से लाया पवित्र जल नेहरू पर छिड़का और उनके माथे पर पवित्र भस्म लगाया। इसके बाद उन्होंने नेहरू को पीतांबर ओढ़ाया और उन्हें गोल्डन राजदंड सौंप दिया। उन्होंने नेहरू को पके हुए चावल भी दिए, जिसे तड़के दक्षिण भारत में भगवान नटराज को अर्पित किया गया था और वहां से विमान से दिल्ली लाया गया था।

राजेंद्र प्रसाद के घर में बनाया गया था मंदिर  

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उस शाम नेहरू और दूसरे लोग संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद के घर गए। उनके घर के पिछले बगीचे में केले के चार पेड़ों की मदद से अस्थायी मंदिर तैयार किया गया था। पवित्र अग्नि के ऊपर हरी पत्तियों की छत तैयार की गई और ब्राह्मण पुजारी ने पूजा की। संविधान सभा के सदस्यों और भावी मंत्रियों पर पुजारी ने पवित्र जल छिड़का। हर पुरुष के माथे पर लाल टीका लगाया। नियति से साक्षात्कार। भारत के प्रतिबद्ध शासक रात में धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में थे। 11 बजे वे संविधान सभा हॉल में एकत्र हुए जो तिरंगे में लिपटा हुआ था। नेहरू ने यहां प्रेरक भाषण दिया।

बेवजह हो रहा विरोध
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि संसद लोकतंत्र का मंदिर है। विपक्ष की तरफ से इसका विरोध बेवजह किया जा रहा है। इसे लेकर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। जब मैं अध्यक्ष थी, तो वही लोग जो आज इसका विरोध कर रहे हैं, अक्सर संसद भवन में बैठने की दिक्कत, जगह की दिक्कत जैसी शिकायतें करते थे।

भारतीय लोकतंत्र का नया मंदिर, कल दो चरणों में नई संसद का लोकार्पण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला रविवार 28 मई को नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का नेतृत्व करेंगे। उद्घाटन समारोह के पहले चरण में सुबह हवन-पूजन का कार्यक्रम संसद में गांधी प्रतिमा के पास पंडाल में आयोजित किया जाएगा।

इसमें पीएम मोदी, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सहित केंद्रीय मंत्री शामिल होंगे। हवन-पूजन के बाद सभी गणमान्य नए संसद भवन में लोकसभा व राज्यसभा परिसरों का निरीक्षण करेंगे। इसी दौरान पारंपरिक अनुष्ठान के साथ लोकसभा कक्ष में अध्यक्ष के आसान के ठीक बगल में पवित्र सेंगोल को स्थापित किया जाएगा। इसमें सेंगोल को बनाने वाले जौहरी व तमिलनाडु के शैवायत थिरुवदुथुरै अधीनम मठ के पुजारी मौजूद रहेंगे। इस अनुष्ठान के साथ ही सुबह का चरण करीब 9:30 बजे समाप्त होगा।

समारोह का दूसरा चरण दोपहर में पीएम मोदी सहित गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में लोकसभा कक्ष में राष्ट्रगान के साथ शुरू होगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ व राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का संदेश सुनाया जाएगा। फिर स्पीकर, जो वस्तुतः संसद के संरक्षक भी हैं, समारोह में शामिल अतिथियों व गणमान्यों को संबोधित करेंगे।

इन लोगों को किया आमंत्रित
समारोह में सभी मौजूदा सांसद, सभी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष, पूर्व राज्यसभा सभापति, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्रालयों के सचिव और खेल, कला, साहित्य के प्रमुख व्यक्तियों को आमंत्रित किया है। नए भवन के वास्तुकार बिमल पटेल व उद्योगपति रतन टाटा को खासतौर पर आमंत्रित हैं।
  • समारोह में राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के भाषण के लिए भी समय रखा गया है। हालांकि, बहिष्कार के चलते समारोह में उनके शामिल होने की उम्मीद नहीं है।
काम रोकने की 3 साल में 9 बार कोशिशें
नए संसद भवन सहित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट रोकने के लिए विपक्ष ने 9 बार सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन पैंतरेबाजी काम नहीं आई। सितंबर, 2019 में सेंट्रल विस्टा परियोजना की शुरुआत हुई। नया संसद भवन भी इसी का हिस्सा है।
  • सबसे पहले 2020 याचिका दायर की गई। दावा था, सेंट्रल विस्टा से जुड़े बदलाव मास्टर प्लान में अधिसूचित नहीं हैं। इसके बाद जून, 2020 में एक और याचिका में कहा गया, सेंट्रल विस्टा के तहत अवैध तरीके से भूमि उपयोग बदला गया है।
  • जुलाई, 2020 में नए भवन के निर्माण पर रोक के लिए याचिका दायर की गई। जुलाई, 2020 में ही एक और याचिका में पर्यावरणीय मंजूरी के खिलाफ सेंट्रल विस्टा रोकने की मांग की गई।
  • मई, 2021 में महामारी के नाम पर काम रोकने की याचिका लगाई गई। अक्तूबर, 2021 में भूमि उपयोग में बदलाव को चुनौती देते हुए परियोजना को चुनौती दी गई।
  • नवंबर, 2021 में सेंट्रल विस्टा से वायु प्रदूषण की बात कह कर रोकने की मांग की गई। जुलाई, 2022 में नए भवन की छत पर अशोक स्तंभ के खिलाफ याचिका दायर हुई।

पुराने संसद भवन का सफर

1927 में वायसराय लॉर्ड इरविन ने किया उद्घाटन, 2023 में पीएम मोदी दे रहे विदाई यहीं हुआ भारत विभाजन का फैसला और भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने फोड़ा था बम

मौजूदा संसद भवन का 96 वर्ष का लंबा सफर रहा है। भारत की आजादी का साक्षी रहा यह भवन 28 मई से पुराना संसद भवन कहा जाएगा। शानदार वास्तुशिल्प के लिए विख्यात इस इमारत से करीब एक सदी तक भारत की नियति तय की गई। 18 जनवरी, 1927 को वायसराय लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया था और 28 मई, 2023 को पीएम मोदी इसे विदाई दे रहे हैं। भारत के लोकतंत्र के मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित, नौ दशक के सफर में पुराने संसद भवन ने अंग्रेजों की फूट डालो राज करो और भारत के टुकड़े करने वाली नीतियों को देखा है। बम धमाके कर अंग्रेजों को ललकारते हुए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को देखा है। भारत की आजादी और भारत के संविधान बनने की पूरी प्रकिया को देखा है।
  • बेमिसाल वास्तुकला : 144 बलुआ पत्थरों के स्तंभों पर टिकी इस गोलाकार इमारत को मध्य प्रदेश के मुरैना स्थित चौसठ योगिनी मंदिर से प्रेरित माना जाता है। करीब छह एकड़ में 560 फीट के व्यास और एक-तिहाई मील की परिधि में फैली इस इमारत के वास्तुविद हर्बर्ट बेकर व एडविन लुटियंस थे।
  • प्रिंस आर्थर ने रखी थी आधारशिला : दस्तावेज के मुताबिक, आजादी से 26 साल पहले 12 फरवरी, 1921 को इसकी आधारशिला रखते हुए ड्यूक ऑफ कनॉट प्रिंस आर्थर ने कहा था, यह भवन भारत के पुनर्जन्म के प्रतीक के रूप में खड़ा होगा, जो इसे ऊंचे मुकाम पर ले जाएगा। 18 जनवरी, 1927 को वायसराय इरविन ने काउंसिल हाउस के तौर पर इसका उद्घाटन किया।
  • बदल गया नाम : ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के शासन में संसद भवन की यात्रा असल में कोलकाता की जगह दिल्ली को राजधानी बनाने के विचार के साथ शुरू हुई। लुटियंस और बेकर ने इसे आकार दिया। वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) और नॉर्थ ब्लॉक व साउथ ब्लॉक इसके केंद्र बने।
  • वायसराय हाउस बना राष्ट्रपति भवन : भारत में ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि लॉर्ड इरविन रायसीना हिल पर बने वायसराय हाउस में रहने वाले पहले शख्स बने। 1950 में भारत के गणतंत्र बनने के बाद इसे राष्ट्रपति भवन घोषित किया गया।
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270 से ज्यादा पूर्व नौकरशाह व प्रतिष्ठित नागरिक बोले-गर्व का पल

नए संसद भवन का विरोध कर रहे विपक्ष के नाम सेवानिवृत्त नौकरशाहों, पूर्व सैन्य अधिकारियों और शिक्षाविदों सहित देश के 270 से ज्यादा प्रतिष्ठित नागरिकों ने खुला पत्र जारी किया। पत्र में कहा है, हर भारतीय के लिए यह गर्व का पल है। लेकिन, विरोध लोकतंत्र की आत्मा पर हमले जैसा है।

खुले पत्र पर 88 सेवानिवृत नौकरशाह, 100 सैन्य अधिकारी, 82 अकादमिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित नागरिकों ने हस्ताक्षर किए हैं। पत्र में लिखा है, नए भवन का विरोध करने वाले लोगों को समझ नहीं आ रहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहिष्कार के नाम पर लोकतंत्र की आत्मा पर हमला कर रहे हैं। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में एनआईए के पूर्व निदेशक योगेशचंद्र मोदी, पूर्व डीजीपी एसपी वैद, बीएल वोहरा व विक्रम सिंह, पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी, निरंजन देसाई, वीरेंद्र गुप्ता, जेएस सपरा और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी गोपाल कृष्ण और सीएस खैरवाल शामिल हैं।

अलोकतांत्रिक : पत्र में कांग्रेस की प्रकृति को अलोकतांत्रिक व अहंकार से भरा बताते हुए चार घटनाओं का भी ब्यौरा दिया है, जिनका कांग्रेस व विपक्ष ने अतीत में बहिष्कार किया था। खासतौर पर बजट सत्र से पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण के विरोध का जिक्र करते हुए कहा, कांग्रेस जहां एक तरफ अब राष्ट्रपति के सम्मान की बात कर रही है।
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