भारत में इंटरनेट से जुड़ी दो खबरें इन दिनों चर्चा में हैं, जिसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इंटरनेट के बढ़ते कदम हमारे लिए कितने मुफीद हैं। पहली ये कि मोबाइल डेटा इस्तेमाल में भारत दुनिया में नंबर एक हो गया है। नीति आयोग के अनुसार हम 150 करोड़ जीबी प्रतिमाह के साथ नंबर 1 उपभोक्ता बन गए हैं। यहां तक कि इतना डेटा अमेरिका चीन मिलकर भी इस्तेमाल नहीं कर रहे।
दूसरी बात ये कि एनसीबी ने गुरुग्राम स्थित ऑनलाइन फार्मेसी का भंडाफोड़ किया जो अवैध रूप से अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों को 'हर्बल दवा' के नाम पर नशीली दवाएं भेजने के कार्य में संलिप्त थी। खास बात यह है कि ड्रग की यह तस्करी गैंग ने इंटरनेट के जरिए कर रहा था। यह यकीनन भारतीयों के तेजी से डिजिटल युग में प्रवेश करने का संदेश है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है।
महज एक साल पहले तक भारत इस फेहरिस्त में 155वें नंबर पर था। इसके पीछे भारत सरकार का डिजिटलाइजेशन पर जोर और डेटा नेटवर्क में 4जी के आगमन को वजह माना जा सकता है। हालात यह हो गए कि देश में जहां 20 करोड़ जीबी डेटा की खपत होती थी, वहीं अब यह 150 करोड़ जीबी प्रति माह हो गया है। हालांकि इस दौरान डेटा टैरिफ कॉस्ट भी काफी घटी है, जो कि 250 रुपए से 50 रुपए प्रति जीबी पर पहुंच चुकी है।
पिछले दिनों देश में 4जी स्मार्टफोन की संख्या भी तेजी से बढ़ी। मार्च 2017 में ये 4 करोड़ 70 लाख से बढ़कर 13 करोड़ 10 लाख हो गई और वायरलेस ब्रॉडबैंड सब्सक्राइबर्स की संख्या भी बढ़कर 28 करोड़ के पार चली गई। इस सारी कवायद के बीच यह भी गौर करने वाले तथ्य हैं कि इंटरनेट का बेजा इस्तेमाल बढ़ा है। ड्रग तस्करी के अलावा साइबर क्राइम में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीबी) की ओर से भी कहा गया है कि यह पहली बार हुआ है जब देश में सक्रिय ऐसे अवैध ड्रग रैकेट्स का पता चला है, जो डार्कनेट और बिटकॉइन का इस्तेमाल कर रहे हैं।
डार्कनेट की अंधेरी दुनिया
डार्कनेट इंटरनेट का बेहद गुप्त नेटवर्क है जिसका इस्तेमाल विशेष सॉफ्टवेयर, कॉन्फिगरेशन और प्राधिकार के जरिए ही किया जा सकता है और सामान्य कम्यूनिकेशन प्रोटोकॉल और पोर्ट के जरिए इसका पता लगाना बेहद मुश्किल है। बिटकॉइन डिजिटल करंसी या मुद्रा होती है जिसकी मदद से वैध बैंकिंग चैनल से बचकर इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन किया जा सकता है।
इंटरनेट, जिसका इस्तेमाल हम-आप रोजाना करते हैं, जैसे कि फेसबुक, गूगल, वॉट्सएप- यह महज 10% ही है वेब वर्ल्ड का। 90% हिस्सा इंटरनेट का वह है, जिसे आम यूजर कभी एक्सेस नहीं करता। इसे डीप वेब के तौर पर जाना जाता है।