काल की बड़ी क्षिप्र गति है। वह इतनी शीघ्रता से चला जाता है कि सहसा उस पर हमारी दृष्टि नहीं जाती। हम लोग मोहावस्था में पड़े ही रहते हैं और एक-एक पल, एक-एक दिन और एक-एक वर्ष करके काल हमारे जीवन को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में चुपचाप ले जाता है। जब कभी किसी एक विशेष घटना से हमें अपनी यथार्थ अवस्था का ज्ञान होता है, तब हम अपने में विलक्षण परिवर्तन देखकर विस्मित हो जाते हैं।
उस समय हमें चिंता होती है कि अब वृद्धावस्था आ गई है, अब हमें अपने जीवन का हिसाब पूरा कर देना चाहिए। दर्पण में प्रतिदिन ही हम अपना मुख देखते हैं, पर अवस्था का प्रभाव इतने अज्ञात रूप से होता है कि हम अपने मुख पर सहसा कोई परिवर्तन नहीं देख पाते। सभी तरह की निर्बलता और शिथिलता का अनुभव करने पर भी मैं यह नहीं समझता कि यह अवस्था स्पृहणीय नहीं है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि वृद्धावस्था में जीवन के विकास की जो चरमावस्था आ जाती है, उसमें हम लोगों के सभी भाव, रस के रूप में परिणत होकर आनंदमय हो जाते हैं।
वृद्धावस्था का सच्चा आनंद है आत्म-संतोष। जिन्हें भविष्य की चिंता है, वे वृद्ध नहीं हैं। वे तरुण ही हैं, क्योंकि उन्हें कार्यों की ओर चिंता अवश्य प्रेरित करेगी। जीवन की संध्या अपने साथ एक अपूर्व श्री लाती है। ज्योति क्षीण हो जाती है, उन्माद नष्ट हो जाता है; पर मन में भाव का मृदु पवन बहता है, सहानुभूति की मृदु तरंगें उठती हैं, संसार हर्ष के मधुर कलरव से पूर्ण हो जाता है, चिर संचित स्नेह का दीप प्रज्वलित होता है और मन के नभोमंडल में उदीयमान नक्षत्रों की तरह कितनी ही मधुर स्मृतियां उदित होती हैं।
-दिवंगत हिंदी साहित्यकार