आप अपने शहर या गांव में आवारा पशुओं को कोई भी खाद्य पदार्थ देकर दयाभाव दिखा सकते हैं, लेकिन अगर आप लद्दाख में हैं तो यह सब नहीं चलेगा। वहां पर्यटकों का यह दयाभाव जानवरों को मौत के मुंह में ले जा रहा है। इसी के चलते लद्दाख में जानवरों पर मेहरबानी करना एक गुनाह हो गया है।
दरअसल बात यह है कि लद्दाख में जिस तेजी से पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से वहां जानवरों की कई दुर्लभ प्रजातियां भी खत्म होने लगी हैं। दूसरी ओर, पूरे लद्दाख क्षेत्र में किसी भी आर्मी या अर्धसैनिक बल के कैंप के बाहर स्थानीय कुत्तों की कतार देखी जा सकती है। इन कैंपों तक पहुंचने के लिए कुत्तों को कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, केवल खाने के लिए।
बता दें कि लदाख क्षेत्र, खासतौर पर लेह से वाया खार्दूंगला होते हुए पर्यटक जब नुबरा घाटी में पहुंचते हैं तो उन्हें बीच में पश्मीना भेड़, बकरी, गाय और मरमोट आदि मिल जाते हैं। इनमें मरमोट तो लुप्तप्राय: जीवों की श्रेणी में जा पहुंचा है।
रास्ते में हिमालयन गधा व घोड़ा भी देखने को मिलता है। नुबरा घाटी से जब पेंगोंग लेक की ओर जाते हैं तो बीच में चांगथंग इलाका पड़ता है। यहां पर पहले बड़ी संख्या में मरमोट होते थे, लेकिन अब इनकी संख्या सिमट गई है।
लद्दाख में कार्यरत मुख्य पशु पालन अधिकारी डॉ. मोहम्मद इकबाल का कहना है कि यहां के जानवरों का पेट भरने के लिए प्रकृति ने इन्हें केवल जंगली घास दी है। इसी घास के सहारे मरमोट, गधा, घोड़ा, भेड़-बकरी, गाय और दूसरे कई पशु जीवित रहते हैं।
घास में प्राकृतिक तौर पर सभी तरह के जरूरी पौष्टिक तत्व होते हैं। पिछले कुछ सालों से देखने में आया है कि लद्दाख घूमने के लिए आने वाले पर्यटक इन जानवरों पर दयाभाव दिखाकर इन्हें कुछ खाने को दे देते हैं। नतीजा, इनके लिए यह कदम जानलेवा साबित होता है। विशेषकर, छोटे जानवर इसी वजह से मारे जा रहे हैं।