कहते हैं सियासत में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता। सियासत में बर्चस्व को लेकर जुदा हुए रालोद मुखिया अजित सिंह और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव में फिर दोस्ती की पीग बढ़ी है। दोनों पहले दोस्त फिर दुश्मन और अब फिर दोस्त बनने की राह पर चल निकले हैं। 27 साल में दोनों के बीच सियासी दोस्ती और दुश्मनी चलती रही है। दोनों दलों में दोस्ती होने पर यूपी खासकर पश्चिमी यूपी में सियासी तस्वीर का बदलना तय है। इससे भाजपा और बसपा को कड़ी चुनौती खड़ी होगी। चौधरी चरण सिंह का कुनबा भी फिर से एक हो जाएगा।
पूर्व प्रधानंमंत्री चौधरी चरण सिंह की सियासी विरासत को लेकर मुलायम सिंह और अजित सिंह केबीच पुरानी आदावत है। अजित सिंह खुद को उनका बेटा होने के कारण असल वारिस बताते रहे हैं, मुलायम सिंह कर्म के आधार पर खुद केवारिस होने का दावा करते हैं। 1989 में यूपी में जनता दल की सरकार गठन के वक्त सीएम बनने को लेकर दोनों आमने सामने आ गए थे।
आखिर में तत्कालीन पीएम वीपी सिंह के हस्तक्षेप से विधायक दल की मीटिंग बुलाई और वोटिंग कराई। अजित की जगह विधायकों ने मुलायम सिंह को नेता और चुने और वह सीएम बन गए। उसके बाद अजित सिंह अलग हो गए। सीएम की कुर्सी नहीं मिलने से खफा अजित सिंह ने 2002 में मुलायम सिंह से बदला लिया। उन्होंने भाजपा और बसपा के साथ मिलकर सूबे में सरकार बनवा दी। अजित के दांव से मुलायम चित हो गए और सरकार नहीं बना सके।