जिस पिता ने अपनी लाडली को गोद में खिलाया, अंगुली पकड़ कर उसे चलना सिखाया।इसके बाद वह दिन भी आया जब वह पिता अपनी बेटी के हाथ पीले करने की तैयारी करने लगा। उसे नहीं मालूम था कि लिखने वाले ने उसके लिए कुछ और ही लिख दिया था। बेटी को आतंकी कसाब ने मार दिया और उसके पिता को ड्यूटी व जज्बात, इनमें से किसी एक राह पर चलने की चुनौती दे दी। बेटी जैसमीन को खो चुके पिता ने जज्बात पर काबू पाकर अपनी ड्यूटी की राह पकड़ ली।
इत्तेफाक देखिए कि मुंबई हमले के बाद में कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उस अर्धसैनिक बल को मिली, जिसके ऑपरेशन की जिम्मेदारी जैसमीन के पिता निभा रहे थे। आईटीबीपी के तत्कालीन आईजी (ऑपरेशन) एमएस भुर्जी ने अपनी बिटिया के हत्यारे को फांसी के फंदे पर लटकने तक उसकी सुरक्षा में कोई चूक नहीं होने दी। भुर्जी 2017 में रिटायर हुए हैं और अब मोहाली में रहते हैं।
बता दें कि 26/11 के मुंबई हमले के दौरान होटल ओबरॉय ट्रायडेंट में आतंकवादियों की पहली गोली रिसेप्शन पर मौजूद जैसमीन को लगी थी। कसाब की फांसी के बाद उस पिता के दिल को थोड़ा सुकून मिला, जिसने उसकी लाडली जैसमीन को छीन लिया था। एमएस भुर्जी का कहना था कि घाव अभी नहीं भरे। थोड़ा सुकून इसलिए है कि निर्दोष लोगों को मारने वाले कसाब की फांसी से वे देश सबक लेंगे, जो तोड़फोड़ की मंशा रखते हैं।
बीते दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि होटल प्रबंधन की पढ़ाई करने के बाद जैसमीन ताज मुंबई में ट्रेनिंग के लिए गई थी। हमें ही नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों को भी वह खूब हंसाती थी। बेशक वह फोन पर बात करती, मगर ऐसा लगता था कि जैसे सामने बैठकर बोल रही है। ड्यूटी के दौरान भी उसका यह अंदाज नहीं बदला। मोहाली में अंतिम संस्कार के वक्त होटल प्रबंधन से आए अधिकारियों ने जब परिवार के साथ उसकी यादें सांझा की तो कोई अपने आंसू नहीं रोक पाया था।