भारत का आर्थिक विकास (सांकेतिक तस्वीर)
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पीएम नरेंद्र मोदी की विदेशी मुद्रा की अपील से विकास की गति सुस्त पड़ जाने का खतरा भी है। दरअसल, पीएम की उपभोग में कटौती पर केंद्रित है, मगर यह टिकाऊ समाधान नहीं है। असल जरूरत भारत के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने की है। पीएम की अपील में जिन चीजों का जिक्र है, उनका बड़ी मात्रा में आयात किया जाता है। जब हम सोना, खाद, खाद्य तेल से लेकर टूथब्रश तक देश के बाहर से खरीदते हैं, तो इससे आरबीआई के पास जमा विदेशी मुद्रा का भंडार कम हो जाता है। दरअसल, देश के बाहर से सामान मंगाने के लेनदेन में हम अपने रुपये का इस्तेमाल कर डॉलर खरीदते हैं और फिर उन्हीं डॉलर का इस्तेमाल कर देश के बाहर से सामान मंगाते हैं। सामान्य परिस्थितियों में, दुनियाभर के लोग भी भारतीय सामान खरीदते हैं और इस तरह वे भारतीय रुपये खरीदने के लिए डॉलर का इस्तेमाल करते हैं। इसके परिणामस्वरूप आरबीआई के पास मौजूद भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की बढ़ोतरी होती है, लेकिन अगर भारत का आयात, निर्यात से कहीं अधिक हो जाए, तो स्थिति असंतुलित हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारत डॉलर खर्च करता रहेगा, लेकिन उसे बदले में उतने डॉलर नहीं मिलेंगे। लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने से विदेशी मुद्रा भंडार कम हो जाता है और रुपये की विनिमय दर दूसरी मुद्राओं के मुकाबले कमजोर हो जाती है।
पीएम की अपील काम आएगी
पीएम के सुझाव पर सभी भारतीय अचानक सोने का इस्तेमाल बंद कर दें, घर से बाहर निकलना बंद कर दें, या सिर्फ साइकिल चलाएं, तो यह सच है कि भारत का आयात कम हो जाएगा। इससे डॉलर की हमारी मांग कम हो जाएगी, लेकिन कीमत कुल आर्थिक विकास को चुकानी पड़ेगी, क्योंकि कच्चे तेल, सोने या खाने के तेल का इस्तेमाल करने वाले सभी व्यवसायों की बिक्री में कमी आने की संभावना है। कटौती के कारण होने वाली अक्षमता की तो बात ही अलग है। कमजोर खपत विकास दर को नीचे खींच लेगी, क्योंकि देश पहले से ही कमजोर खपत की समस्या से जूझ रहा है। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद व्यवसायों ने अर्थव्यवस्था में अपना निवेश नहीं बढ़ाया है। ऐसे में, अपील का सख्ती से पालन करना व्यवसायों के लिए और भी हतोत्साहित करने वाला साबित हो सकता है।
विदेश निवेशक मोड़ सकते हैं मुंह
खपत में कटौती से चालू खाते को मदद मिलती है, मगर यह पूंजी खाते की स्थिति को और भी बिगाड़ सकती है। आखिर, विदेशी निवेशक उस अर्थव्यवस्था में वापस क्यों लौटेंगे, जिसे वे पहले से ही नजरअंदाज कर रहे हैं। खासकर तब जब वह अर्थव्यवस्था खपत को और भी कम करने का फैसला करती है। हर चीज में आत्मनिर्भर नहीं बन सकते कोई देश हर चीज में आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। उदाहरण के लिए, भारत अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर है, लेकिन यह आयातित उर्वरकों पर निर्भर करता है। उसे आयातित फीडस्टॉक (जैसे प्राकृतिक गैस या नैफ्था जैसे ईंधन) पर निर्भर रहना पड़ता है। असल में, उर्वरकों की कुल घरेलू उत्पादन लागत का 80% से भी अधिक हिस्सा इसी फीडस्टॉक का होता है। इसी तरह, भारत आयातित कच्चे तेल की जगह जल्दबाजी में किसी भी घरेलू विकल्प का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसके अलावा, ऐसा कोई भी बदलाव अर्थव्यवस्था की गति को धीमा कर देगा।