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उपलब्धि: फंगल संक्रमण व सस्ती एंटी-फंगल दवा से मिलेगी मदद, IIT मद्रास और ICMR ने विकसित किया स्वदेशी मॉडल

Thu, 18 Sep 2025 05:14 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आईआईटी मद्रास और ICMR-NIRRCH के शोधकर्ताओं ने कैंडिडा अल्बिकन्स जैसे घातक फंगल संक्रमण से निपटने के लिए एक उन्नत मॉडल विकसित किया है। यह तकनीक संक्रमण की प्रक्रिया को समझने और नई, असरदार व किफायती एंटी-फंगल दवाएं विकसित करने में मदद करेगी। भारत में हर साल इसके 4.7 लाख मामले सामने आते हैं।

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फंगल संक्रमण (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : FreePik
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विस्तार
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भारत में पहली बार आईआईटी मद्रास और आईसीएमआर-एनआईआरआरसीएच के शोधकर्ताओं ने फंगल संक्रमण से निपटने के लिए ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो न केवल संक्रमण की प्रक्रिया को समझने में मदद करेगा बल्कि नई, असरदार और सस्ती एंटी-फंगल दवाओं के विकास का रास्ता भी खोलेगा। यह शोध खासतौर पर उस फंगल संक्रमण कैंडिडा अल्बिकन्स पर केंद्रित है जो खून में फैलने पर जानलेवा साबित हो सकता है।

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जानकारी के अनुसार कैंडिडा अल्बिकन्स सिस्टमेटिक कैंडीडायसिस नामक गंभीर बीमारी का मुख्य कारण है। यह संक्रमण मुंह, गले, त्वचा या जननांग क्षेत्र से बढ़कर रक्त प्रवाह और आंतरिक अंगों तक पहुंच जाता है। वैश्विक स्तर पर हर साल 15 लाख से अधिक लोग इस संक्रमण की चपेट में आते हैं और लगभग 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इसकी मृत्यु दर करीब 63% तक पहुंच जाती है। भारत में हर साल लगभग 4.7 लाख नए मामले दर्ज होते हैं।

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शोध की खास बातें

इस शोध की सबसे खास बात यह है कि इसमें पहली बार फंगल मेटाबॉलिक मॉडल और मानव मेटाबॉलिक मॉडल को जोड़कर एकीकृत प्रणाली बनाई गई। इससे वैज्ञानिक यह देख सके कि संक्रमण के दौरान फंगल मेटाबॉलिज्म कैसे बदलता है और कौन-सी प्रक्रियाएं इसके जीवित रहने के लिए जरूरी हैं। टीम का नेतृत्व आईआईटी  मद्रास के वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड एआई के प्रो. कार्तिक रमण और आईसीएमआर-एनआईआरआरसीएच मुंबई की प्रो. सुसन थॉमस ने किया।
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ड्रग रेजिस्टेंस के दौर में उम्मीद की किरण
टीम ने इन निष्कर्षों को जानवरों पर प्रारंभिक परीक्षणों में सफलतापूर्वक परखा है। अब अगला कदम क्लीनिकल पार्टनर्स के साथ सहयोग कर मरीजों के सैंपल पर अध्ययन करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा दवाएं कई बार काम नहीं करतीं क्योंकि फंगल स्ट्रेन्स में दवा प्रतिरोध बढ़ रहा है। पारंपरिक तरीके से नई दवाएं खोजने में काफी समय और लागत लगती है। ऐसे में यह डेटा-ड्रिवन सिस्टम बायोलॉजी एप्रोच शोध प्रक्रिया को तेज और ज्यादा सटीक बना सकता है।

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