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Biochar Technology: IIT गुवाहाटी ने विकसित की बायोचार तकनीक, अनानास के छिलके-मौसमी के रेशे साफ करेंगे पानी

Tue, 01 Apr 2025 05:24 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

Biochar Technology: आईआईटी गुवाहाटी ने अनानास के छिलके और मौसमी के रेशों के उपयोग से बायोचार की तकनीक विकसित की, जो औद्योगिक प्रदूषित पानी को साफ करने का एक सस्ता और पर्यावरण अनुकूल तरीका है। यह तकनीक पानी को शुद्ध करने की पारंपरिक विधियों से अधिक प्रभावी और तेज है, जो केवल पांच मिनट में हानिकारक प्रदूषकों को हटा सकती है।
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पानी की गुणवत्ता का परीक्षण (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार
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वैज्ञानिकों ने कारखानों और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को साफ करने का एक अनूठा तरीका इजाद किया है। इस नई तकनीक में फलों के कचरे का उपयोग किया गया है, जो न केवल सस्ता है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है।

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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने अनानास के छिलके और मौसमी के रेशों से बायोचार कर पानी में मौजूद नाइट्रोएरोमैटिक यौगिकों को अवशोषित करने में सफलता पाई है। नतीजे जर्नल केमिकल इंजीनियरिंग साइंस में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार नाइट्रोएरोमैटिक यौगिक ऐसे हानिकारक रसायन हैं जो कपड़ा रंगाई, कीटनाशक और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी में मौजूद होते हैं। ये जीव-जंतुओं के साथ इंसानों के लिए खतरनाक हैं। इनके संपर्क में आने से कैंसर, आनुवंशिक विकृतियों जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। वर्तमान में इस तरह के प्रदूषित जल को साफ करने के लिए जो रासायनिक व जैविक प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं, वे महंगी होने के साथ जटिल भी हैं।

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इनमें कुछ हानिकारक उपोत्पाद(बाय प्रोडेक्ट) भी बनते हैं, जिससे प्रदूषण की समस्या और बढ़ जाती है। इसी चुनौती को हल करने के लिए  शोधकर्ताओं ने फलों के कचरे से बायोचार तैयार किया है।बायोचार एक प्रकार का कार्बन युक्त पदार्थ है, जिसे पायरोलिसिस नामक प्रक्रिया द्वारा उच्च तापमान पर ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैविक पदार्थों को विघटित करके बनाया जाता है।इससे चारकोल, गैस और तरल उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

अनानास और मौसमी के कचरे का अभिनव उपयोग
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में आमतौर पर फेंक दिए जाने वाले अनानास के ऊपरी हिस्से और मौसमी के रेशों का उपयोग किया। इनसे दो प्रकार के बायोचार विकसित किए गए। पहला,अनानास कोमोसस बायोचार(एसीबीसी) और दूसरा साइप्रस लिमेटा बायोपचार (एमएफबीसी)। इन बायोचारों की क्षमता को परखने के लिए वैज्ञानिकों ने इन्हें नाइट्रोफेनॉल नामक प्रदूषक के साथ परीक्षण किया जो आमतौर पर औद्योगिक गंदे और दूषित जल में पाया जाता है। परिणामों से पता चला कि एसीबीसी ने 99 फीसदी और एमएफबीसी ने 97 फीसदी नाइट्रोफेनॉल को हटा दिया। ये दोनों बायोचार मात्र पांच मिनट में प्रदूषकों को अवशोषित करने में सक्षम रहे, जो पारंपरिक जल शुद्धिकरण तकनीकों की तुलना में कहीं अधिक तेज और प्रभावी प्रक्रिया है। पारंपरिक तरीकों में ऐसा करने में बहुत ज्यादा समय लगता है और ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है।

बार-बार उपयोग किया जा सकता है यह बायोचार
यह नई तकनीक केवल तेज और कुशल ही नहीं बल्कि पुनः उपयोग करने योग्य भी है। अध्ययन में पाया गया कि एसीबीसी और एमएबीसी को कई बार उपयोग करने के बावजूद उनकी प्रभावशीलता बनी रही। इसका अर्थ यह है कि ये बायोचार जल शुद्धिकरण के लिए एक लागत प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकते हैं।

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सर्कुलर इकोनॉमी को मिलेगा बढ़ावा
शोध का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर गोपाल दास के अनुसार यह अध्ययन दर्शाता है कि फलों के कचरे को एक महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में बदलकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। इससे न केवल जल प्रदूषण की समस्या से निपटा जा सकता है बल्कि कचरे के बेहतर प्रबंधन से सर्कुलर इकोनॉमी को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

गांवों और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए वरदान
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग केवल औद्योगिक जल शुद्धिकरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी को सुरक्षित बनाने के लिए वाटर फिल्टर के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा यह नदियों और झीलों की सफाई में सहायक हो सकता है और प्रदूषित औद्योगिक इलाकों में मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में भी मदद कर सकता है। चूंकि यह तरीका पारंपरिक जल शुद्धिकरण विधियों की तुलना में सस्ता, प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल है, इसलिए यह एक स्थायी और व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकता है।

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