आईआईटी दिल्ली, आईसीएमआर की एडवाइजरी बॉडी है। यहां के प्रो वी राम गोपालराव और प्रो. विवेकानंद पेरुमल के साथ तीन अन्य प्रोफेसरों और छात्रों की टीम ने कोरोना टेस्ट का सटीक परिणाम देने वाली एक डिवाइस तैयार करने में सफलता पाई है।
इस डिवाइस को आईसीएमआर ने गुरुवार 23 अप्रैल को कड़े परीक्षण के बाद मंजूरी दे दी है। कोविड-19 के संक्रमण का पता लगाने में सक्षम इस डिवाइस के विकास के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव ने प्रो. पेरुमल को फोन पर बधाई दी है।
अमर उजाला से विशेष बातचीत में पेरुमल ने बताया कि तकनीकी की समस्या नहीं है। हमें इसमें सफलता मिली है और यह डिवाइस क्रांतिकारी साबित होगी।
बताते चलें कि आईआईटी की यह टीम काफी समय से कोविड-19 संक्रमण की पहचान के लिए किट या डिवाइस बनाने में लगी हुई थी। इसके लिए संक्रमित के स्वैब सैंपल के लिए वैज्ञानिकों को लंबा इंतजार करना पड़ा था।
इसको लेकर कुछ नैतिक मसले सामने आ रहे थे, लेकिन अंतत: यह अभियान सफल हो गया। टीम का का दावा है कि बाजार में उपलब्ध अब तक किसी भी कोरोना टेस्टिंग डिवाइस से यह काफी कम कीमत पर जांच की सुविधा उपलब्ध कराएगी।
कोरोना की जांच करने के लिए संक्रमित व्यक्ति के थूक की एक बूंद से ही इस माध्यम से लगभग पूर्ण सही परिणाम मिलने का दावा किया जा रहा है।
टेस्टिंग डिवाइस तैयार करने वाली टीम में प्रमुख प्रोफेसर डॉ. विश्वजीत कुंडू ने अमर उजाला को बताया कि अब तक बाजार में उपलब्ध सभी डिवाइस में फ्लोरोसेंट कंपाउंड का इस्तेमाल होता है। यह काफी महंगा होता है।
लेकिन उनकी टीम की तैयार की गई डिवाइस में फ्लोरोसेंट कंपाउंड की जगह साइबर ग्रीन कंपाउंड का इस्तेमाल किया गया है, इसीलिए इसे प्रोब-फ्री कहा जा रहा है। इस वजह से उनकी डिवाइस व्यावसायिक स्तर पर निर्माण के समय काफी सस्ती हो जाएगी।
ये हैं सबसे खास बातें
- डॉक्टर विश्वजीत कुंडू के मुताबिक अभी तक उपलब्ध टेस्टिंग किट केवल कोरोना के वायरस की ही नहीं बल्कि कई अन्य वायरसों की भी पहचान कर लेती है। इसके चलते कई बार वह दूसरे वायरस का संक्रमण पहचान कर पॉजिटिव परिणाम दिखा देती हैं और कोरोनो के संक्रमण का परिणाम निगेटिव दिखाई देने लगता है। इस तरह से परिणाम गलत हो जाता है।
- आईआईटी दिल्ली की तैयार की गई डिवाइस केवल कोरोना के वायरस की पहचान करने में सक्षम है। टीम ने कोरोना के वायरस के एक ऐसे गुण की पहचान कर ली है जो अन्य वायरस में बिल्कुल नहीं पाया जाता है। यह डिवाइस कोरोना के इसी गुण की परख के आधार पर लगभग पूर्ण सही परिणाम दे सकती है।
- इस डिवाइस से चेकिंग के लिए मरीज में संक्रमण का एक हफ्ते या उससे अधिक पुराना होने की भी कोई आवश्यकता नहीं (एंटीबॉडी टेस्टिंग के दौरान करना पड़ता) है। इसमें कोरोना संक्रमित होने के पहले दिन से लेकर बाद के किसी भी स्तर पर डिवाइस से कोरोना की जांच की जा सकती है।
इस टीम ने किया काम
इस डिवाइस को तैयार करने में कुसुमा स्कूल ऑफ बायलोजिकल साइंस के प्रो. विवेकानंद पेरुमल, प्रो. कुंडू, प्रोफेसर मनोज बालाकृष्णन और जेम्स गोम्स के अलावा कई छात्रों ने अपना योगदान दिया है।
यह टीम कोरोना वायरस के दुनिया में सामने आने के बाद से ही इस तरह की डिवाइस की खोज करने में लगी थी। 22 मार्च को इस टीम को काफी सफलता मिली। लेकिन कुछ परिवर्तन के बाद आखिर में 9 अप्रैल को यह डिवाइस अपने अंतिम रूप में तैयार की जा सकी। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पैथोलॉजी ने इसका सफल परीक्षण कर लिया है।