ऑनलाइन बाजार और ऑटोमेशन के कारण हर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियां जा रही हैं और लोग बेरोजगार हो रहे हैं। लेकिन इसी बीच बड़े और मंझोले उद्योग संगठनों के संगठन सीआईआई ने सरकार से मांग की है कि वह मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में सौ फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति प्रदान करे। अगर सरकार इस मांग को मान लेती है तो इससे छोटे व्यापारियों के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो जाएगा।
यही कारण है कि छोटे व्यापारियों के संगठनों ने सीआईआई की इस मांग का कड़ा विरोध किया है और कहा है कि अगर सरकार यह मांग मान लेती है तो देश के करोड़ों खुदरा दुकानदारों की रोजी-रोटी छिन जाएगी। इससे देश में बेरोजगारी इस हद तक बढ़ जाएगी जिसे काबू करना सरकार के लिए भी संभव नहीं होगा।
व्यापारियों के एक प्रतिनिधि संगठन फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया व्यापार मंडल के राष्ट्रीय महामंत्री वीके बंसल ने कहा कि सीआईआई बड़े उद्योग और मंझोले औद्योगिक घरानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है। यह हमेशा केवल उच्च वर्ग को ध्यान में रखकर अपनी राय सरकार के सामने रखती है।
लेकिन सरकार और सीआईआई, दोनों को यह समझना चाहिए कि मल्टी ब्रांड में सौ फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति देने से छोटे व्यापारी उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इन बड़े उद्योगों से केवल ढाई करोड़ लोगों को ही रोजगार मिलता है जबकि छोटे व्यापारियों का खुदरा बाजार चालीस करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मुहैया कराता है। सीआईआई की मांग को मान लेने से इस वर्ग के सामने संकट आ जाएगा।
वहीं कंफेडेरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि देश में लगभग सात करोड़ खुदरा दुकानें हैं जो लोगों के लिए रोजगार का बड़ा माध्यम हैं। इस समय पूरे देश में ऑनलाइन बाजार तेजी से बढ़ रहा है जिससे इन दुकानदारों को कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। लोग मोबाइल फोन से लेकर कपड़े और खानेपीने की चीजें तक ऑनलाइन मार्केट से मंगवा रहे हैं।
इसके कारण छोटे व्यापारी पहले ही संघर्ष कर रहे हैं। अगर सरकार मल्टी ब्रांड क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इजाजत दे देती है तो इन छोटे दुकानदारों पर बड़ा खतरा आ जाएगा। इससे देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैलेगी।