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जल्लीकट्टू नहीं हुआ तो सांड की नस्लों पर खतरा

Fri, 20 Jan 2017 02:22 PM IST
स्वामीनाथन नटराजन/ बीबीसी संवाददाता
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- फोटो : bbc
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जल्लीकट्टू का समर्थन करने वालों के अनुसार तमिलनाडु में बुल फाइटिंग यानी सांडों की लड़ाई के खेल को जिंदा रखना जरूरी है। उनका तर्क है कि इससे स्थानीय मवेशियों की प्रजातियों को बचाया जा सकता है।
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स्पेन की बुल फाइट से अलग जल्लीकट्टू हजारों साल से खेला जाने वाला खेल है। इसमें सांड को मारा नहीं जाता। सारा खेल तीखे सींग वाले सांड पर बांधे गए सोने या पैसे को खोलने का होता है। लेकिन जानवरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं की गुजारिश पर साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर रोक लगा दी। कार्यकर्ताओं ने इस खेल को पशुओं पर अत्याचार बताया था।

खेल पर लगे प्रतिबंध के विरोध में चेन्नई के मरीना बीच समेत कई इलाकों में प्रदर्शन हो रहे हैं। इस विरोध के बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। पीएम नरेंद्र मोदी ने उनसे कहा है कि ये मामला न्यायालय के अधीन है, हालांकि वो समझते हैं कि जल्लीकट्टू तमिलनाडु की परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।
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जल्लीकट्टू की खास बात यह है कि इस खेल में सिर्फ सांड की स्थानीय नस्लों का ही इस्तेमाल किया जाता है। इस खेल का समर्थन करने वाले बालकुमारन सोमू कहते हैं, "तमिलनाडु में छह स्थानीय नस्लें थीं। उनमें से एक नस्ल अलामबदी को तो आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित कर दिया गया है। ये बैन लगा रहा तो बची नस्लें भी खत्म हो जाएंगी।"

जल्लीक़ट्टू की वजह से लोग पालते हैं सांडों को

- फोटो : bbc
सांडों को पालने वालों का कहना है कि जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी की दौड़ के कारण इलाके में स्थानीय नस्लों में मादा और नर मवेशियों का अनुपात बना रहा है। कार्तिकेयन शिव सेनापति कहते हैं, "जल्लीकट्टू ने लोगों को उत्साहित किया है कि वो अपने बैलों, सांड़ों को पालें। चूंकि ये परिवार और समुदाय की इज्जत की बात है, किसान उनका अच्छा ख्याल रखते हैं। ये बैन लागू रहा तो लोगों में सांडों को रखने का उत्साह नहीं बचेगा।"

सेनापति कंगायम नस्ल के सांड पालने वाले कुछ लोगों में से एक हैं। वो बताते हैं कि साल 1990 में हमारे यहां करीब दस लाख कंगायम नस्ल के सांड थे, अब यहां इस नस्ल के केवल 15,000 सांड ही बचे हैं।

तमिलनाडु देश का सबसे शहरीकृत राज्य है। खेती में आधुनिक मशीनों का उपयोग होता है और सांड को रखने की आर्थिक वजहें कम ही हैं। दूध के लिए मवेशियां पालने वाले भी अभी उन्नत किस्म के मवेशियों का रुख कर रहे हैं। ऐसे छोटे किसान अब केवल गाय ही रखने लगे हैं और जरूरत पड़ने पर पैसे दे कर जल्लीकट्टू के सांडों की सेवाएं लेते हैं।

सेनापति बताते हैं, "पहले हम 4:1 के अनुपात में अपने पास गाय और सांड रखा करते थे, अब यह अनुपात 8:1 तक पहुंच गया है और यह और बढ़ेगा। किसान केवल पालने भर के लिए इस तरह के बड़े जानवर नहीं खरीद सकते।"

कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि गांवों से स्थानीय नस्ल के सांडों को हटा दिया जाए तो किसान जानवरों में कृत्रिम गर्भाधान कराएंगे। फिर बूढ़े बैलों को बेच दिया जाता है। लेकिन अब युवा सांड़ों को भी कसाइखानों को बेच दिया जाता है। तेजी से बढ़ते इस आंकड़े को देखकर एक गैरसरकारी पशु अधिकार संगठन ने 200 सांड खरीद लिए।

सांड ना जिएं हिंसा भरा जीवन

- फोटो : bbc
कोयंबटूर कैटल केयर एस निजामुद्दीन का कहना है, "किसी कानून के अंतर्गत बचाने की कोई कवायद नहीं की गई है। इसीलिए इन्हें अगर मांस के लिए बेच दिया गया तो हम इन्हें बचा नहीं सकते। एक ही रास्ता बचा है इन्हें बचाने का, वो ये कि हम इन्हें खरीद लें।" वो गायों में गर्भाधान में इन सांडों का इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं।

तमिलनाडु जल्लीकट्टू फेडरेशन के अध्यक्ष पी राजशेकरन का कहना है, "मैंने जितने सांड खरीदे मुझे उनमें कोई चोट या घाव के निशान नहीं मिले। कई किसान उन्हें सिर्फ इसीलिए बेच रहे हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आगे क्या होगा।" वो कहते हैं, "अगर कोई सांड को मारता है, उसे चोट पहुंचाता है तो इसे पकड़ें, सजा दें - हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इसके लिए पूरा बैन लगाना सही नहीं।"

पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार जल्लीकट्टू पर रोक लगाए जाने से काफी पहले आर्थिक कारणों स्थानीय नस्लों के मवेशियों की संख्या कम हुई है। एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया के डॉ। 

एस चिन्नी कृष्णा कहते हैं, "हमारा मूल मुद्दा जानवरों की बेहतरी है, ना कि उनकी नस्ल बचाना।" वो कहते हैं कि वो सांडों को बचा रहे हैं और पशुपालन गृहों में उनका ध्यान रख रहे हैं ताकि ब्रीडिंग में उनसे मदद ले सकें। हालांकि वो कहते हैं कि यह सही नहीं है कि एक जानवर को बस अपनी नस्ल बचाने के लिए एक हिंसा भरी जिंदगी जीनी पड़े।
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जल्लीकट्टू में सांड को नहीं पहुंचती चोट

- फोटो : bbc
मदुरई में रहने वाले पांडियान रंजीत जल्लीकट्टू में हिस्सा लेते हैं। वो कहते हैं कि पशु अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता इसे बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं। वे कहते हैं, "मैं बीते 20 सालों से सांडों के इस खेल में हिस्सा लेता हूं। मुझे कई बार चोट आई है। मैंने कई बुल फाइटरों को गंभीर रूप से घायल होते देखा, लेकिन मैंने कभी किसी सांड को कभी घायल होते नहीं देखा।"

हालांकि पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सांडों को खेल से पहले शराब पिलाई जाती है ताकि वो इधर-उधर भागें।

घोड़ों की रेस का क्या?
जल्लीकट्टू का समर्थन करने वालों का कहना है कि घोड़ों की रेस पर क्यों कोई रोक नहीं लगाई जाती या मंदिरों में रखे जाने वाले हाथियों पर कोई कुछ क्यों नहीं करता।
तमिलनाडु में कोई राजनीतिक पार्टी इस खेल पर पूरे बैन का समर्थन नहीं करती। इस वजह से विरोध का आयोजन करने वालों को उम्मीद है कि अगले साल से पहले वो इस मामले में क़ानूनी नहीं तो कम से कम राजनीतिक हल तक पहुंच सकते हैं।
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