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आईसीएमआर ने एचसीक्यू दवा के इस्तेमाल को लेकर डब्ल्यूएचओ को लिखा पत्र

Fri, 29 May 2020 03:21 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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हाइड्रोक्सीक्लोक्विन दवा (सांकेतिक) - फोटो : social media
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की उस सलाह पर संदेह जताया था जिसमें कोरोना वायरस के मरीजों का इलाज करने के लिए हाइड्रोक्सीक्लोक्विन दवा (एचसीक्यू)  के इस्तेमाल को बंद करने की बात कही गई। अब देश की सरकारी एजेंसी भारतीय भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने डब्ल्यूएचओ को पत्र लिखा है। इसमें कोरोना वायरस के मरीजों के इलाज में एचसीक्यू दवा के भारतीय और अंतरराष्ट्रीय ट्रायल में डोज (मात्रा) में भिन्नता की बात कही गई है। 

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आईसीएमआर का कहना है कि कोरोना वायरस के गंभीर मरीज जो आईसीयू में भर्ती होते हैं, उनका इलाज करने के लिए भारत सरकार उन्हें पहले दिन सुबह और रात को 400-400 एमजी एचसीक्यू का डोज देती है। इसके बाद अगले चार दिनों तक उन्हें सुबह और शाम 200-200 एमजी एचसीक्यू दी जाती है। मरीज को पांच दिन में दी जाने वाली दवा का कुल डोज 2400 एमजी है।

नाम न जाहिर करने की शर्त पर बात करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने मंत्रालय और आईसीएमआर को डब्ल्यूएचओ के मूल्यांकन पर असहमति को लेकर बताया कि सबसे बड़ा अंतर भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दवा के डोज का है।
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अधिकारी ने कहा, अतंरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रायल में मरीजों को छह घंटे में दो बार एचसीक्यू के 800-800 एमजी का डोज दिया जाता है। इसके बाद उन्हें 10 दिनों तक दिन में दो बार 400-400 एमजी का डोज देते हैं। यानी 11 दिन में मरीज 9600 एमजी का डोज लेता है जो हमारे यहां से चार गुना अधिक है।

अधिकारी ने कहा कि इससे पता चलता है कि एचसीक्यू का डोज हमारे इलाज के प्रोटोकोल में ज्यादा प्रभावशाली और अच्छा है। मरीज दवा का कम डोज दिए जाने पर भी ठीक हो रहे हैं। एचसीक्यू दवाओं के जरिए कोविड-19 मरीजों के ठीक होने से मिली शुरुआती सफलता को लेकर ही आईसीएमआर ने डब्ल्यूएचओ को पत्र लिखा है।

यह पत्र डब्ल्यूएचओ की एकजुटता परीक्षण की राष्ट्रीय समन्वयक डॉक्टर शीला गोडबोले ने मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन को लिखा है। इसमें उन्होंने कहा है कि सुरक्षा चिंता के लिए परीक्षण को निलंबित करने का कोई कारण नहीं है।
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