सार
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने सीडीएससीओ के साथ मिलकर श्वसन बीमारियों की जांच किट्स जैसे कोविड-19, इन्फ्लूएंजा और आरएसवी की गुणवत्ता और सटीकता जांचने के लिए नया प्रोटोकॉल तैयार किया है। यह कदम घटिया किट्स से गलत रिपोर्ट्स को रोकने और जांच की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए लिया गया है।
आईसीएमआर का बड़ा फैसला (प्रतीकात्मक)
- फोटो : एएनआई / पेक्सल्स डॉट कॉम
भारत में घटिया किस्म के जांच उपकरणों पर जल्द रोक लगेगी। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के साथ इन-विट्रो डायग्नोस्टिक (आईवीडी) किट्स की गुणवत्ता और भरोसेमंद के लिए एक मूल्यांकन प्रोटोकॉल तैयार किया है। यह विभिन्न तरह की जांच किट्स जैसे इन्फ्लूएंजा, सार्स-कोव-2 और आरएसवी की सटीकता और प्रभावशीलता की जांच को मानकीकृत करने की दिशा में तैयार किया है।
मसौदे में स्पष्ट है कि अभी इसका दायरा श्वसन संबंधी बीमारियों की जांच किट्स तक सीमित रहेगा, जिसमें इन्फ्लूएंजा वायरस, कोविड-19 और रेस्पिरेटरी सिंसिशीयल वायरस (आरएसवी) की पहचान के लिए बनाए गए सिंगल या मल्टीप्लेक्स टेस्ट शामिल हैं। दरअसल कोरोना के दौरान बड़ी संख्या में जांच किट्स बाजार में आए। इनमें से कई की गुणवत्ता पर सवाल उठे और राज्यों से गलत नतीजों की शिकायतें भी सामने आईं।
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क्या कहना है विशेषज्ञ?
विशेषज्ञ मानते हैं कि एक समान मानक न होने के कारण परीक्षणों की विश्वसनीयता पर असर पड़ा। इसी के चलते अब यह नया प्रोटोकॉल बनाया गया है ताकि किसी भी आईवीडी उत्पाद को बाजार में लाने से पहले उसकी संवेदनशीलता, विशिष्टता और प्रदर्शन का एक समान पैमाने पर मूल्यांकन हो। फिलहाल आईसीएमआर ने मसौदे पर उद्योग जगत, वैज्ञानिकों और नीति विशेषज्ञों से सुझाव मांगे हैं।
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सटीक जांच से होगा बेहतर उपचार
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस मसौदे को लागू करने के बाद भारत में आईवीडी किट्स के लिए एक सुनियोजित नियामक ढांचा खड़ा हो जाएगा। इससे जहां आम मरीजों को सही और समय पर निदान मिलेगा, वहीं कंपनियों के लिए भी वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के नए अवसर खुलेंगे। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि मानकीकृत मूल्यांकन से रोगों की पहचान अधिक सटीक होगी। गलत नतीजों के कारण होने वाली दवा की बर्बादी और मरीजों की परेशानी को भी कम किया जा सकेगा।