केंद्र सरकार ने बाल पोषण में बदलाव के लिए नए सिरे से वैज्ञानिक तथ्यों के साथ नीति बनाने का फैसला लिया है। इसके लिए जल्द ही वैज्ञानिकों की एक टीम बनेगी जो तीन चरणों में अध्ययन करेगी।
इस टीम में प्रत्येक राज्य का एक सदस्य होगा ताकि भौगोलिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित रह सके। सरकार ने छह से 36 माह की उम्र के शिशुओं को लेकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान योजना के तहत वैज्ञानिकों को जिम्मेदारी सौंपी है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य लक्ष्य शिशुओं में बौनापन, कुपोषण और कमजोरी जैसी स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करना है। सरकार से अनुमति मिलने के बाद नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एक पत्र भी जारी किया है जिसमें देश भर के शोधकर्ताओं से इस अध्ययन में न सिर्फ जुड़ने की अपील की है। साथ ही कहा है, प्रभाव डालने के लिए तैयार हो जाइए।
बौनेपन में आई कमी
06 से 24 माह की उम्र वृद्धि के लिए बेहतर
डॉक्टरों के अनुसार, छह से 24 माह की उम्र किसी भी शिशु के लिए वृद्धि और विकास के लिए सबसे बेहतर होती है। यह एक ऐसा पड़ाव होता है जो बच्चे के भविष्य की शारीरिक और मानसिक विकास को बढ़ावा देता है। हालांकि देश में बौनापन और अल्पपोषण का जोखिम भी काफी है जिसकी वजह से सालाना लाखों मासूम बच्चे चपेट में आ रहे हैं। अगर भौगोलिक स्थिति के आधार पर देखें तो अधिकांश मामलों में शिशु के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होना है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में खराब भोजन प्रथाएं, देरी से पूरक आहार देना भी एक कारण है।
दुनिया के आधे कमजोर बच्चे भारत में
घर पर राशन...जमीन पर असर कम
सरकार बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं में पोषण की कमी दूर के लिए टेक होम राशन प्रदान करती है जिसे आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए उपलब्ध कराया जाता है लेकिन आईसीएमआर का मानना है कि जमीनी स्तर पर खराब पूरकता की वजह से योजना का असर कम दिखाई दे रहा है। आईसीएमआर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सरकार के इस राष्ट्रीय कार्यक्रम पर दोबारा गौर करने और नई नीति के साथ-साथ गांव-गांव तक पहुंचने की जरूरत है।