भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की शोधकर्ता सुगन्या बरनी तीन सामाजिक-मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के साथ महामारी की एक समग्र तस्वीर पर शोध कर रही हैं। इसमें स्वास्थ्यकर्मी, जनता के बीच कोरोना को कलंक मानना और लॉकडाउन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव शामिल हैं।
कलंक परियोजनाओं का गुणात्मक और मात्रात्मक परीक्षण स्वास्थ्यकर्मियों पर हमलों, प्रवासियों की वापसी के हाशिए और परीक्षण के परिणाम की प्रतीक्षा करने वालों की आत्महत्या के बाद किया गया।
वहीं आईसीएमआर के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन ट्यूबरकुलोसिस (एनआईआरटी) की डॉक्टर बीना थॉमस ने कहा, ‘हमारे पास प्रिंट और सोशल मीडिया में बहुत सारे वास्तविक सबूत हैं। लेकिन हमें नीति में बदलाव और हस्तक्षेप के लिए और सबूत चाहिए।’ डॉ. थॉमस ने एक उप-समूह का नेतृत्व किया जिसने आगामी अध्ययनों को तैयार किया।
शोध अध्ययन की देखरेख करने वाले आईसीएमआर नेशनल टास्क फोर्स के एक प्रमुख सदस्य ने कहा, ‘हमने इसे प्राथमिकता पर लिया है। हमारा अध्ययन प्रयोगशाला में काम करने वाले व्यक्तियों, डॉक्टरों, नर्सों, एंबुलेंस में काम करने वाले व्यक्तियों, स्वास्थ्य प्रबंधकों, परीक्षा परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे लोगों को लेकर, उन लोगों के परिवार को लेकर जो पॉजिटिव हैं और पॉजिटिव व्यक्ति खुद को समझने के लिए किस तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं उसे लेकर है।’
अगले हफ्ते से शुरू हो रहे एक अध्ययन में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और अन्य कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य का पता लगाया जाएगा, जो 10 केंद्रों में कोविड-19 रोगियों की देख-रेख कर रहे हैं। एक अन्य अध्ययन का उद्देश्य कोविड-19 से संबंधित कलंक के निर्धारण को समझना है, जिसके माध्यम से तीन बिंदुओं- कलंक (ज्ञान की कमी), दृष्टिकोण और अनुभूति को देखा जाएगा। तीसरा शोध लॉकडाउन के तहत समाज के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों के सामने आने वाली चुनौतियों पर होगा।