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'एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों...'

Mon, 04 Jul 2016 03:46 PM IST
वुसअतुल्लाह खान/इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
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- फोटो : getty
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जब अगली बार मैं आपसे बात करूंगा तो ईद आकर जा भी चुकी होगी। बिल्कुल वैसे ही जैसे मेरे बचपन का वो बाबा गुजर गया जिसकी आवाज रात के तीन बजे दूर से सन्नाटा तोड़ते हुए आती और फिर दूर होती चली जाती। "रोजे वालों रोजा रख लो...अगला रमजान किसने देखा...अल्लाह के प्यारों रोजा रख लो।"
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सात साल की उम्र में मेरा पहला रोजा आया और चला गया। आज भी याद है कि ईद से एक दिन पहले किसी को बताए बगैर रोजा रख लिया। दादी ने अम्मा को समझाया 'ऐ..हैं..जब बच्चे ने रख ही लिया है तो तुड़वाना नहीं।' और फिर पड़ोसियों और आसपास के रिश्तेदारों को भी खबर हो गई कि मुन्ने मियां ने खुद से ही पहला रोजा रख लिया।

सूरज फीका पड़ते ही सब जमा होने लगे। मुझे रसोई से बहुत दूर बिठाया गया कि कहीं मजे-मजे के खानों की खुशबू मेरा रोजा खराब ना कर दे। और फिर मां ने मगरिब की अजान होते ही शरबत अपने हाथ से पिलाया और इतनी फूल-मालाएं गले में पड़ीं कि आंख भी छुप गई।
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'बाबा, ये लाल पन्नी वाली ऐनक क्या होती है?'

- फोटो : अमर उजाला
आज इतने साल बीत जाने के बाद जब मैं अपने बच्चों को बताता हूं कि हम ईद पर लाल पन्नी वाली ऐनक खरीद कर लगाते थे तब वे पूछते हैं, "बाबा, ये लाल पन्नी वाली ऐनक क्या होती है?"

हम काठ के उड़नखटोले में चरख..चूं...चरख...चूं ऊपर से नीचे गोल-गोल जाते थे। और बाइस्कोप वाला तो खास ईद के दिन अपना जादू वाला फिल्मी डब्बा लाता था।

बाइस्कोप वाला डब्बे के नीचे लगी फिरकी घुमाता जाता और डिब्बे के अंदर तस्वीर बदलती जाती।

"सत्रह मन की धोबन देखों, मक्का देखों, मदीना देखों, अंग्रेजी मैम देखों।"

और फिर हम चांदी के वरक लगा लाल चूरन भी खाते थे जिसको सोचकर आज भी लार टपकने लगती है। घर-घर मिठाई और सेवइयां भी बांटने जाते थे।

फिर दोपहर को जी भरकर बंदर का तमाशा भी देखते थे। "मगर बाबा आजकल ये सब क्यों नहीं होता। कहां गया ये सब?" ऐसे सवालों पर मैं मुस्कुरा कर रह जाता हूं। जानता हूं कि मेरे बच्चे भी कल अपने बच्चों के ऐसे सवालों पर मुस्कुरा कर रह जाएंगे।
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'वो छोटा सा नन्हा सा लड़का कहां?'

- फोटो : getty
इस वक्त मुझे इब्ने इंशा की ये नज्म जाने क्यों याद आ रही है।
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ
जी मचलता था एक-एक शय पर मगर
जेब खाली थी कुछ मोल न ले सका
लौट आया, लिए हसरतें सैकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूं तो एक-एक दुकां मोल लूं
आज चाहूं तो सारा जहां तौल लूं
नारसाई का अब जी में धड़का कहां
पर वो छोटा सा नन्हा सा लड़का कहां?
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