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"मैंने सड़क पर मरे कुत्ते को देख कर नशा करना छोड़ दिया"

Sun, 08 Apr 2018 03:25 PM IST
बीबीसी, हिंदी
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ड्रग्स की लत
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"मैं अपने डेढ़ साल के बेटे के सामने ब्राउन शुगर लिया करता था। यहां तक कि मैं उसके नाम पर लोगों से भीख में पैसे मांगा करता था।" कभी ड्रग्स के आदी रहे तुषार नाथु उन दिनों में खो गए जब वो इसकी लत में डूबे हुए थे। 18 साल की उम्र में तुषार को ड्रग्स की लत लगी थी और वो चरस, भांग, अफीम, गांजा, ब्राउन शुगर, हर तरह का नशा किया करते थे। वो बताते हैं, "आखिर में मेरी मां ने आत्महत्या की कोशिश की। मेरी पत्नी की शिकायत पर अंतिम उपाय के रूप में मुझे जेल में भी रखा गया था।" 

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उन्हें मानसिक रोगियों के अस्पताल भेजा गया और पुनर्वास केंद्र में भी रखा गया, लेकिन बाहर निकलते ही वो एक बार फिर नशे की जाल में जकड़ गए। "अड़ियल प्रकृति और अस्थिर रवैये के कारण मैं इसके बिना जीवित नहीं रह सकता, मैं पूरी तरह से इसका आदी हो चुका हूं।" ड्रग्स की लत से जुड़ी अपने विचारों पर जब एक महिला युवा समाजसेवी ने हमें बताया तो हम नागपुर के एक पुनर्वास केंद्र में तुषार से मिले।

'उड़ता' महाराष्ट्र?

भारत में पंजाब के युवाओं के ड्रग्स की लत की चर्चा इतनी हुई कि बॉलीवुड में उस पर फिल्म तक बन गई। लेकिन महाराष्ट्र के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। वास्तव में, ड्रग्स से जुड़ी आत्महत्याओं की सूची में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है। 2014 में भारत में ड्रग्स से जुड़ी 3,647 मामले सामने आए, इनमें से अकेले महाराष्ट्र में 1,372 आत्महत्याएं हुईं। 552 मामलों के साथ तमिलनाडु दूसरे, 475 आत्महत्याओं के साथ केरल तीसरे और 38 के साथ पंजाब चौथे स्थान पर रहा। पिछले साल जुलाई में, नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीआरबी) के इन आंकड़ों को देश के सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री विजय सांपला ने राज्यसभा में सदन के पटल पर रखा।
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इसके अनुसार, देश में की गई 37 फीसदी आत्महत्याओं की रिपोर्ट महाराष्ट्र दर्ज की गईं। समाजसेवी और सलाहकारों के अनुसार देश में लोग कई तरह की नशीली चीजों के आदी हैं- इनमें भांग, गांजा, चरस, अफीम, ब्राउन शुगर, तारपीन जैसी रासायनिक वस्तुएं, वाइटनर और यहां तक कि नेल पॉलिश और पेट्रोल जैसी चीजों की लत शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से कई ड्रग्स का पता लगाना मुश्किल है क्योंकि वे शराब की तरह गंध नहीं छोड़ते।

नशे की आदी महिलाओं का क्या?

महिलाओं में ऐसी किसी लत की सीमाओं का पता लगाना और भी मुश्किल है क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे मामलों की रिपोर्ट नहीं होती। मुक्तांगण पुनर्वास केंद्र की निदेशक मुक्ता पुणताम्बेकर ने इसके मूल कारणों की ओर इशारा किया। वो कहती हैं, "महिलाओं का ड्रग्स लेने की आदत को कलंक के रूप में देखा जाता है। लोग इसे छिपाने की कोशिश करते हैं और उन्हें डॉक्टरों के पास नहीं ले जाते।"

नागपुर के मेडिकल मनोवैज्ञानिक और सलाहकार डॉ। स्वाति धर्माधिकारी कहती हैं, "महिलाओं को पुरुषों की तरह इलाज नहीं मिलता। महिलाओं के लिए बहुत ही कम पुनर्वास केंद्र हैं और वो आसानी से शोषण की शिकार हो जाती हैं।" महाराष्ट्र में सरकारी सहायता से चलने वाले पुनर्वास केंद्रों की संख्या सबसे अधिक है। भारत के कुल 435 ड्रग्स पुनर्वास केंद्रों में से 69 महाराष्ट्र में हैं। इनमें से केवल कुछ ही महिलाओं के लिए हैं।

मुक्तांगण के क्षेत्रीय संयोजक संजय भगत सवाल करते हैं, "अगर कोई समाजसेवी किसी ड्रग्स लेने वाली महिला की पहचान करता है, तो वो उसे कहां ले जाए।" हालांकि केवल महिलाओं के लिए केंद्र बनाना भी मुश्किल काम है क्योंकि प्रशिक्षित महिलाओं की कमी है। 2009 में मुक्तांगण ने महिलाओं के लिए 15 बिस्तरों वाले केंद्र 'निशिगन्ध' की शुरुआत की थी। मुक्ता पुणतांबेकर कहती हैं, "यहां सभी स्टाफ महिलाएं हैं जिससे महिला मरीजों को अजीब न लगे।"

वो कहती हैं, "हमारे यहां अपने पिता, पति और बेटों की नशे की लत से बुरी तरह प्रभावित महिलाओं के लिए एक सपोर्ट ग्रुप है। हम उन्हें यहां पेशेवर डॉक्टरों और सलाहकारों की मदद से मरीजों की देखभाल करने का प्रशिक्षण देते हैं। और वे डॉक्टरों और सलाहकारों की सहायक के रूप में यहां काम करती हैं।" इस सम्मिलित प्रयास से नशे की लत से मुक्ति पा चुकी कुछ महिलाओं को नौकरी का एक अवसर भी मिलता है। लेकिन वास्तविक समस्या यह है कि कितनी संख्या में महिलाएं ड्रग्स की समस्या से पीड़ित हैं इसकी कोई व्यापक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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ड्रग्स की लत
'बहुत जटिल समस्या'

2001 के बाद से भारत में ड्रग्स की लत के जुड़ा कोई व्यापक सर्वेक्षण नहीं है। 2016 में केंद्र सरकार ने देश में "ड्रग्स की लत के फैलाव, पैटर्न और ट्रेंड पर राष्ट्रीय सर्वेक्षण' की घोषणा भी की। इसके दायरे में 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सभी महिलाएं और ट्रांसजेंडर सभी आते हैं, जिनकी संख्या पिछले सर्वे में नगण्य है। इसके रिपोर्ट की इसी साल अक्तूबर में आने की संभावना है।

राष्ट्रीय सर्वे परियोजना के लिए डेटा संग्रह कर रही इकाई का नेतृत्व कर रहे मुक्तगण के संजय भगत कहते हैं, "लेकिन इसके नतीज विशेषज्ञों को भी परेशान कर रहे हैं।" वो कहते हैं, "अब तक हमने जो मिला वो बहुत ही विचलित करने वाला है। यह बहुत बड़ी जटिल समस्या के छोटे हिस्से के जितना है। ड्रग्स की लत वालों की संख्या बढ़ रही है और बड़ी संख्या में लोग कम उम्र में इसके आदी होते जा रहे हैं।"

जब इसकी अंतिम रिपोर्ट आएगी तभी हम भारत में इस समस्या की वास्तविक चिंताजनक स्थिति के बारे में जान सकेंगे। मुक्ता कहती हैं, "इसका सामना करने का एकमात्र तरीका यह है कि हम लत की समस्या के बारे में जागरूकता पैदा करें और लोगों को इसके खतरे से दूर करने की कोशिश करें।"

नई जिंदगी का निर्माण

नागपुर के हिंगना औद्योगिक क्वार्टर में एक सुनसान सड़क पर स्थित कारखानों से घिरा मैत्री पुनर्वास केंद्र अपने आप में एक पूरी दुनिया है। इसके प्रांगण में पालतू चिड़ियाएं, कबूतरें, मुर्गे और बतखें सूरज की चमकती किरणों के बीच दाना चुग रहे हैं। डारमेट्री हॉल में करीब 115 व्यसनी (नशे की लत वाले इन लोगों को यहां मित्रा या फ्रेंड कहा जाता है) योग सत्र में भाग ले रहे हैं।

यहां तुषार अब एक सलाहकार के रूप में काम करते हैं। वो कहते हैं, "मैंने सड़क के किनारे एक मरे हुए कुत्ते को देखा। और फिर मैंने सोचा कि एक दिन मेरे साथ भी ऐसा ही होगा। तब से 14 साल हो चुके हैं, अब मैं पूरी तरह से सुधर गया हूं।" अब वो शांतिपूर्ण पारिवारिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं और उनका बेटा एक कॉलेज में पढ़ रहा है। तुषार ने अपने अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है।

कभी खुद एक व्यसनी मैत्री के संस्थापक रवि पांडे के साथ तुषार अब खुद दूसरों की मदद कर रहे हैं। रवि इस व्यसन के पीछे परिवार की पृष्ठभूमि, काम में तनाव, सहकर्मियों के दबाव जैसे विभिन्न कारणों को बताते हैं। 
वो कहते हैं, "खुशी मनाने का तरीका बदल गया है। लोग शराब और सिगरेट पीते हैं और बाद में इसी की लत लग जाती है।" पिछले दशक में, मुंबई और पुणे के पास के कुछ छोटे कस्बे खबरों में आए क्योंकि वहां रेव पार्टी पर रेड मारी गई थी, यह खतरे की सूचना है।

मैत्री में हमारी मुलाकात यश (बदला हुआ नाम) से भी हुई जो अपनी किशोरावस्था की उम्र से ही पिछले 12 सालों से ड्रग्स की लत में घिरे थे। अब 28 के हो चुके यश अब अपने किये पर पछता रहे हैं। वो हिम्मत जुटा कर धीमी आवाज में कहते हैं, "मैंने अपने शरीर को नुकसान पहुंचाया है। मैं डांस प्रतियोगिताओं में भाग लेता था, राष्ट्रीय स्तर पर। लेकिन अब मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं।"

लेकिन उनकी कातर निगाहें उनके दर्द को बयां करती हैं। वो कहते हैं, "अब मैंने खुद में बदलाव लाए हैं। सर हमेशा हमें संयमित रहने और खुद पर नियंत्रण रखने के लिए कहते हैं ताकि हम खुद को ड्रग्स की दुनिया में वापस जाने से रोक सकें। मैं कड़ी मेहनत कर रहा हूं। मैं इससे उबर सकता हूं।"
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