जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी समूहों को दिए जाने वाले सरकारी फंड को तत्काल बंद करने की गुहार संबंधी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। पीठ ने कहा कि यह तय करना विधायिका का काम है, लिहाजा अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती। साथ ही पीठ ने कहा कि जनहित याचिका दायर कर इस तरह का मसला नहीं उठाया जा सकता। पीठ ने अदालत में हुर्रियत नेताओं के लिए अलगाववादी शब्द के इस्तेमाल पर भी एतराज जताया।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने वकील एमएल शर्मा द्वारा दाखिल इस याचिका को जनहित याचिका मानने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि सुरक्षा के नाम पर किसे फंड दिया जाना है ओर किसे नहीं, यह तय करना विधायिका का काम है। इस तरह का मसला न्यायिक परीक्षण के दायरे से बाहर है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता वकील की ओर से हुर्रियत नेताओं को अलगाववादी कहने पर आपत्ति जताई। पीठ ने सवाल किया, आप अलगाववादी किसे कह रहे हैं? क्या सरकार ने उन्हें अलगाववादी घोषित कर रखा है? पीठ ने कहा कि यह लोगों की धारणा से जुड़ा मसला है। किसी व्यक्ति के काम करने तरीका अलग हो सकता है, जो दूसरे लोगों को पसंद न हो और वे अलगाववादी कह सकते हैं, लेकिन अदालत में आप इस शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते।
याचिका में गुहार की गई थी कि इस तरह के फंड को असंवैधानिक और गैरकानूनी करार देते हुए हमेशा के लिया बंद कर दिया जाना चाहिए। सरकार को ऐसे लोगों को फंड देने से रोकना होगा जो देश के हित के खिलाफ काम करते हैं। याचिका में कहा गया था कि पिछले करीब पांच सालों में इन अलगाववादियों की सुरक्षा, उनके घूमने और रहने पर करीब 356 करोड़ रुपये खर्च किए गए। उन्हें लग्जरी होटलों में रखने के मद में सरकार ने 21 करोड़ रुपये खर्च किए। उनकी यात्रा पर खर्च होने वाले ईंधन पर 26.43 करोड़ रुपये खर्च हुए और इन सभी यात्राओं में भारत विरोधी गतिविधियां हुईं। ये खर्च आम लोगों से लिए वसूले जाने वाले टैक्स से हो रहा है और वह भी बिना संसद को जानकारी दिए। सीएजी ने भी इसे लेकर कोई ऑडिट रिपोर्ट पेश नहीं की कि आखिरकार इस फंड कहां इस्तेमाल होता है क्योंकि यह खर्च देश के खिलाफ विद्रोह करने के लिए हो रहा है। याचिका में यह भी गुहार की गई है कि जो लोग इस तरह का गैरकानूनी फंड जारी कर रहे रहे हैं, सीबीआई को उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।