एक नेत्रहीन कैदी, फांसी की सजा काट रहा एक कैदी और दो महिलाओं को इस साल तिनक-तिनका इंडिया अवॉर्ड के लिए चुना गया है। इन सभी कैदियों ने जेल को बेहतर बनाने में अपना योगदान दिया है। मानवधिकार दिवस की पूर्व संध्या पर तिनका-तिनका फॉउंडेशन ने 9वें राष्ट्रीय तिनका-तिनका इंडिया अवॉर्ड्स की घोषणा की। ये अवॉर्ड्स आज गुरुग्राम की जिला जेल में दिए गए।
इस श्रेणी में इन्हें मिला पुरस्कार
इस बार राष्ट्रीय तिनका-तिनका इंडिया अवॉर्ड पाने वाले उत्तर प्रदेश की जिला जेल में बंद शाहजहांपुर के 56 वर्षीय राजकुमार पाल सबसे उम्रदराज कैदी हैं। उन्हें विशेष उल्लेख श्रेणी (स्पेशल मेंशन) में यह अवॉर्ड मिला है। जबकि गुजरात की लाजपोर सेंट्रल जेल के 26 वर्षीय कैदी अनिल सुरेंद्र सिंह यादव सबसे कम उम्र के पुरस्कार विजेता हैं। पेंटिंग श्रेणी में अनिल को यह अवॉर्ड मिला है।
डॉ. वर्तिका नन्दा ने पुरस्कार देने की शुरुआत की
गौरतलब है कि साल 2015 में तिनका-तिनका इंडिया अवॉर्ड्स की परिकल्पना डॉ. वर्तिका नन्दा ने की थी। इन अवॉर्ड्स के जरिए भारतीय जेलों में रचनात्मकता और मानवता को बढ़ावा दिया जाता है। इन पुरस्कारों को चार अलग-अलग श्रेणियों में दिया जाता है। खास बात यह है कि इसमें पेंटिंग श्रेणी के लिए हर साल एक विशेष थीम दी जाती है। पेंटिंग के लिए इस साल थीम- ‘जेलों में टेलीविजन’ थी। इसके अलावा स्पेशल मेंशन, तिनका बंदिनी और जेल प्रशासक की श्रेणियों में पुरस्कार दिए गए है।
जूरी में यह लोग रहे शामिल
1. श्री सुनील कुमार सिंह, आईपीएस (सेवानिवृत्त), पूर्व डीजी जेल, तमिलनाडु,
2. श्री बी.के. उपाध्याय, आईपीएस पूर्व डीजी होम गार्ड्स एवं पूर्व एडीजी जेल, महाराष्ट्र
3. डॉ. वर्तिका नन्दा, संस्थापक, तिनका तिनका फाउंडेशन
देश भर की जेलों से सैकड़ों एंट्रीज
पुरस्कार के लिए देश भर की जेलों से सैकड़ों एंट्रीज प्राप्त हुईं। इनमें महिला कैदियों की 35 से ज्यादा एंट्रीज शामिल हैं। इस बार पुरस्कार समारोह में 11 कैदियों को उनकी असाधारण पेंटिंग, जबकि पांच कैदियों को ‘स्पेशल मेंशन’ श्रेणी के तहत सम्मानित किया गया। इसके अलावा दो महिला कैदियों को तिनका-तिनका बंदिनी पुरस्कार और दो जेल प्रशासकों को उनके जेल सुधार में उल्लेखनीय योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया है।
हुनर ने दिलवाई पहचान
इस साल पेंटिंग श्रेणी में कुल 11 कैदियों को उनकी असाधारण रचनात्मक प्रतिभा के लिए सम्मानित किया गया है। दिल्ली की तिहाड़ जेल के विचाराधीन कैदी प्रदीप रोहिल्ला (33) को प्रथम पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। प्रदीप की पेंटिंग भारत की जेलों में कैदियों को बाहर की दुनिया से जोड़ने को दर्शाती है। साल 2015 से गाजियाबाद की जिला जेल में बंद विचाराधीन कैदी अरुण राणा (32) ने पेंटिंग श्रेणी में दूसरा पुरस्कार हासिल किया है। वहीं, तमिलनाडु की सेंट्रल जेल, त्रिची के सजायाफ्ता कैदी सोलाई गणेशन (42) को तीसरे पुरस्कार से नवाजा गया है। पेटिंग श्रेणी में ही देश की अलग-अलग जेलों के आठ कैदियों को सांत्वना पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। 26 साल के अनिल सुरेंद्र सिंह यादव (जेल का नाम) सबसे कम उम्र के पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें पेंटिंग श्रेणी में सांत्वना पुरस्कार मिला है। इस श्रेणी में अन्य पुरस्कार विजेता हैं- मनीश बाबूलाल परमार (46 वर्ष, गुजरात ), शुभम उपाध्याय (27 वर्ष, उत्तर प्रदेश) अजीत सिंह (37 वर्ष, चंडीगढ़) नेत्रपाल सिंह लोधी (42 वर्ष, मध्य प्रदेश) शत्रुहन गोंड (छत्तीसगढ़), दुखनासन बरिहा (33 वर्ष, छत्तीसगढ़) और नेताई बोगी (35 वर्ष, पश्चिम बंगाल)।
कम है आंखों की रोशनी, लेकिन जज्बा है मजबूत
इस साल स्पेशल मेंशन श्रेणी में उन कैदियों को सम्मानित किया गया है, जिन्होंने जेलों के भीतर विभिन्न क्षेत्रों में अतुलनीय योगदान दिया है। इस बार स्पेशल मेंशन अवॉर्ड को हासिल करने वालों में शाहजहांपुर जिला जेल के 56 वर्षीय कैदी राम कुमार पाल शामिल हैं। पाल ने कमजोर दृष्टि होने के बावजूद पिछले 5-6 वर्षों में सैकड़ों कैदियों को शिक्षित करने और सकारात्मक वातावरण को बढ़ावा देने का काम किया है। जींद की जिला जेल के 32 वर्षीय कैदी जय भगवान, जेल रेडियो जॉकी के रूप में दूसरे कैदियों के लिए प्रेरणा बने हैं। उनके लिखे गीत कैदियों को प्रेरित करते हैं। जिला जेल, गुरुग्राम में आजीवन कारावास की सजा काट रहे गिरि राज में पिछले पांच वर्षों में सकारात्मक बदलाव आया है। उन्होंने एक कुशल माली के रूप में जेल में स्वच्छता बनाए रखने और आसपास के वातावरण को सुंदर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
आरजे बनकर सबका मन बहलाया
देहरादून की जिला जेल के नेत्रहीन कैदी डॉ. सुचित नारंग को भी स्पेशल मेंशन अवॉर्ड दिया गया है। उन्हें जेल के रेडियो जॉकी के रूप में असाधारण काम के लिए पहचाना जाता है। जिला जेल, प्रोथरपुर, पोर्ट ब्लेयर, अंडमान और निकोबार के 54 वर्षीय कैदी पारा टोप्पो ने व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लिया है। टोप्पो ने साथी कैदियों को फर्नीचर बनाने और बुनाई में प्रशिक्षण देने का काम किया है। पारा टोप्पो को भी इस श्रेणी के तहत सम्मानित किया गया है। इन कैदियों ने जेल की दीवारों के भीतर अनकही चुनौतियों के बीच जेल जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए अतुलनीय काम किया है।
दो महिलाओं को भी मिला अवार्ड
इस साल दो महिला कैदियों को विशेष तिनका-तिनका बंदिनी अवॉर्ड से नवाजा गया है। 2010 से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद आरती वीरेंद्र ने एक लेखिका के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आरती तिनका-तिनका तिहाड़ परियोजना का भी हिस्सा रह चुकी हैं। वर्तमान में आरती जेल के अंदर लाइब्रेरियन की जिम्मेदारी निभा रही हैं। उनके रचनात्मक प्रयासों में एक प्रकाशित पुस्तक में योगदान देना और अपनी कविताओं के माध्यम से साथी कैदियों को प्रेरित करना शामिल है। साल 2011 से वेल्लोर जेल, तमिलनाडु में बंद शर्मिला बेगम वर्तमान में एम.ए. कर रही हैं। वह सक्रिय रूप से जेल से संबंधित कार्यों में उपस्थित रहती हैं। शर्मीला पैरा लीगल वॉलंटियर के रूप में कानूनी सहायता भी प्रदान करती हैं और साथी कैदियों को सार्थक कार्य के माध्यम से सकारात्मक बदलाव अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी करती हैं. उन्हें भी इस बार तिनका तिनका बंदिनी अवॉर्ड से नवाजा गया है।
जेल प्रशासक अवॉर्ड के लिए 26 नामांकन
इस साल जेल प्रशासक अवॉर्ड के लिए 26 नामांकन मिले। इनमें से दो जेल प्रशासकों को इस अवॉर्ड के लिए चुना गया है। जिला जेल, सोनीपत के अधीक्षक राजेंद्र सिंह ने कैदियों की शैक्षिक प्रोफ़ाइल को बढ़ाने में असाधारण प्रयास किए हैं। उन्होंने दो हजार से अधिक व्यक्तियों के लिए साक्षरता कक्षाओं के साथ-साथ विश्वविद्यालय और तकनीकी शिक्षा का भी आयोजन किया है। सिंह ने जेल के बाहर कैदियों के बच्चों की शिक्षा भी सुनिश्चित की है। जेल रेडियो स्थापित करने की उनकी पहल से जेल में शिक्षा और मनोरंजन दोनों का लाभ हुआ है।
इस श्रेणी में अन्य पुरस्कार विजेता का नाम है चंद्रकांत रामभाऊ सांगले. यरवदा सेंट्रल जेल, महाराष्ट्र में बतौर जेलर II के तैनात सांगले 23 वर्षों से अधिक की सेवा दे चुके हैं। सांगले को कैदियों के सुधार के लिए विभिन्न कार्यक्रम शुरू करने, कौशल विकास, औद्योगिक प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित और गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से कैदियों की रिहाई के बाद उनके रोजगार के अवसरों को सुविधाजनक बनाने के लिए सम्मानित किया गया है।
कौन है डॉ. वर्तिका नन्दा
डॉ. वर्तिका नन्दा दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में पत्रकारिता विभाग की प्रमुख हैं। उन्हें 2014 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा स्त्री शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जेलों पर उनके काम को दो बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह मिली है। डॉ. नन्दा के काम का उल्लेख 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय एक महत्वपूर्ण आदेश में भी किया गया था। ‘भारतीय जेलों में महिला कैदियों और उनके बच्चों की स्थिति और उत्तर प्रदेश के विशेष संदर्भ में उनकी संचार आवश्यकताओं का अध्ययन’ पर उनके शोध को आईसीएसएसआर द्वारा मूल्यांकन कर उसे ‘उत्कृष्ट’ माना गया। तिनका तिनका श्रृंखला की तीन पुस्तकें – तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका डासना और तिनका तिनका मध्य प्रदेश भी जेल जीवन पर उत्कृष्ट कृतियों के रूप में पहचानी जाती हैं और कारागार जीवन पर एक प्रामाणिक दस्तावेज हैं।