आयोग का कहना है कि यह पहली बार नहीं हुआ है, जब सड़कों पर आंदोलन, राजनीतिक रैली या वीआईपी मूवमेंट की वजह से किसी की जान गई हो। इस समस्या का गहराई से विश्लेषण करने और प्रभावी सुरक्षा उपाय अपनाए जाने की जरूरत है, ताकि ऐसी गतिविधियों के चलते किसी का बहुमूल्य मानव जीवन खोने न पाए।
इसके लिए खासतौर पर एम्बुलेंस और आपातकालीन वाहनों के लिए सड़कों पर यातायात को आसान बनाने की जरूरत है। इस हादसे के पीछे दो मुख्य वजह रही हैं, पहली ये कि एम्बुलेंस के लिए अलग से पैसेज की व्यवस्था प्रावधान नहीं था, और दूसरी, एम्बुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे आपातकालीन उपकरण नहीं थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नवजात बच्चे के परिजनों का आरोप है कि रैली के चलते वे ट्रैफिक जाम में 45 मिनट तक फंसे रहे और एम्बुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था नहीं थी। नवजात को पहले सोनीपत रैफर किया गया और बाद में रोहतक हॉस्पिटल भेज दिया गया, लेकिन डेढ़ घंटा देरी के चलते रास्ते में ही नवजात बच्चे ने दम तोड़ दिया। एम्बुलेंस स्टाफ का दावा है कि डीजे के कानफाड़ू शोर में एम्बुलेंस का सायरन और बच्चे के रोने की आवाज दब गई और उसने दम तोड़ दिया।