इन कथावाचकों का भी है जबरदस्त प्रभाव
आरएसएस के करीबी कहे जाने वाले संत उत्तम स्वामी का आशीर्वाद लेने के लिए भी नेताओं की होड़ लगी है। वे भी भागवत कथा के लिए जाने जाते है। आए दिन भाजपा से जुड़े कई बड़े नेता इनके दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते है। मालवा निमाड़ में इनका अच्छा खासा प्रभाव है।
आगरा के प्रसिद्ध कथावाचक और आध्यात्मिक गुरु देवकीनंदन ठाकुर भारतीय संस्कृति के साथ भाजपा के पक्षधर माने जाते है। पिछले साल उज्जैन में इनकी कथा में भारी भीड़ देखी गई थी। इस आयोजन में अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा नेताओं ने ही तन,मन और धन से सेवा की थी। चुनाव को देखते हुए मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी देवकीनंदन ठाकुर की कई कथा होनी है।
इनके अलावा भिंड जिले के लहार में रावतपुरा सरकार का मंदिर स्थित है। संत रविशंकर महाराज को रावतपुरा सरकार के नाम से प्रसिद्धि मिली है। इनके आश्रम के पास हनुमान जी का विशालकाय मंदिर है। राजनीतिक तौर पर रावतपुरा सरकार के पास मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में भी इनका असर है। हर बड़ी पार्टी का छोटा-बड़ा नेता यहां कभी न कभी नतमस्तक होकर गया है।
संत रामभद्राचार्य मौजूदा समय में चार जगतगुरु में से एक हैं। भोपाल में हुए बड़े कथा कार्यक्रम में मुख्यमंत्री से लेकर बीजेपी और कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने पहुंचकर उनका आशीर्वाद लिया था।
आखिर नेताओं के लिए क्यों जरूरी है यह कथा और भव्य आयोजन
- राजनीतिक जानकारों का कहना है कि, अधिकांश कथावाचक या साधु-संत अपनी कथा में राजनीति पर भी टिप्पणी करते हुए नजर आते है। ऐसे में चुनावी साल में राजनीतिक दलों को इनकी जरूरत होती है। ताकि इनके जरिए आम लोगों में माहौल तैयार हो सके।
- प्रदेश के बुंदेलखंड, निमाड़ और मालवा भाग में कथा प्रचलन बहुत पुराना है। कई विधायक वर्षों से इस तरह की कथा का आयोजन करते आ रहे है। ये कथा वाचक कार्यक्रम के दौरान स्थानीय नेता की तारीफ भी करते है। जिससे दल और पार्टी प्रचार हो जाता है
- प्रदेश की 230 सीटों में 100 सीटों पर इन कथावाचकों को प्रभाव देखा जा रहा है।
- कई बार नेताओं के लिए संत सीधे तौर पर वोट मांगने का काम करते हैं, तो कई संत अंदरूनी तौर पर संदेश भेज देते हैं। जिस सीट पर कड़ा मुकाबला होता हैं। वहां इन साधु-संतों की भूमिका और भी ज्यादा बढ़ जाती है।
- कई संत नेताओं को पार्टी का टिकट दिलवाने में भी मदद करते हैं और सत्ता में आने के बाद नेता भी संतों और कथावाचकों का कर्ज उतारते हैं।