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कितना व्यावहारिक है फिर से बैलेट युग में लौटना

Wed, 20 Dec 2017 11:02 AM IST
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली 
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मतपत्र बाॅक्स में डालती महिला (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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चुनाव नतीजों के बाद जीत हार के विश्लेषण अपने-अपने तरीके से होते रहते हैं। हारने वालों के लिए जिस तरह हर बार ईवीएम और वीवीपैट जैसी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मशीनें एक मुद्दा होती हैं, इस बार भी रही हैं। नतीजे आने के बाद नहीं, बल्कि बहुत पहले से। पहले जब बैलेट पेपर से चुनाव होते थे तो मतपेटियां लूटने से बूथों पर कब्जे की कहानियां सुनाई पड़ती थीं, अब जबकि ईवीएम आ गए तो उसमें गड़बड़ी करने के आरोप लगते हैं।
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इसी का ताजा संस्करण है वीवीपैट यानी वोटर वेरिफाएबल ऑडिट ट्रेल मशीनें। नागालैंड और गोवा में इस मशीन के प्रयोग के बाद अब गुजरात की सभी 182 सीटों के लिए बने 50264 बूथों पर ईवीएम के साथ साथ वीवीपैट मशीने भी लगाई गईं। चुनाव आयोग के दावे के मुताबिक दोनों मशीनों की जांच के बाद आंकड़े सौ फीसदी सही आए। लेकिन भाजपा विरोधियों ने हार का ठीकरा फोड़ने के लिए पहले से ही ये तैयारी कर रखी थी कि भाजपा ने मशीनों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां कराई हैं। 

ईवीएम में गड़बड़ियों का आरोप झेलने वाली भाजपा के लिए ये आरोप मायने नहीं रखते और भाजपा नेता ये कहते हैं कि अगर मशीन में गड़बड़ी हुई तो फिर कांग्रेस ने इतनी सीटें कैसे जीतीं। देश को इक्कीसवीं सदी और कम्प्यूटर युग तक लाने की बुनियाद रखने वाले राजीव गांधी ने जो परिकल्पनाएं की थीं, ईवीएम, वीवीपैट या चुनाव की इन आधुनिक तकनीक की कहानी वहीं से शुरू होती है।
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लेकिन अब जब देश डिजिटल होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है तो इन तमाम व्यवस्थाओं पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। फिर से बैलेट पेपर की बात हो रही है। ईवीएम की विश्वसनीयता खतरे में बताई जा रही है और डाटा हैकिंग से लेकर मशीनों के गलत इस्तेमाल और ब्लू टूथ के जरिये इन पर नियंत्रण कर लेने के किस्से सामने आ रहे हैं। 
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ईवीएम से बैलेट पेपर युग में लौटना आसान होगा?

ईवीएम मशीन
चुनाव आयोग से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक पहले ईवीएम पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए, अब वीवीपैट पर 3174 करोड़ रुपए खर्च किए गए। अब 2019 के चुनाव के लिए पब्लिक सेक्टर की दो कंपनियों बीईएल और ईसीआईएल को ऐसी 16 लाख मशीनें बनाने के ठेके दिए गए हैं।

चुनाव प्रक्रिया को आसान करने और जल्दी नतीजे आने का जो ये सिलसिला शुरू हुआ, उससे पहले की लंबी चुनावी प्रक्रिया, कई-कई दिनों की मशक्कत, सुरक्षा पर होने वाले खर्च के तुलना में बहुत सारी सहूलियतें सामने आईं। चुनाव आयोग ने इसके लिए एक अलग सेल बनाया, आईटी से लेकर तमाम तकनीकी विशेषज्ञों को अपने साथ जोड़ा और जाहिर है सरकार की मदद से चुनाव की व्यवस्थाओं को इतना सरल बना दिया।

जब देश में हर साल कई बार चुनाव होने हों तो ऐसी पुख्ता व्यवस्थाएं जरूरी हो जाती हैं। ऐसे में एक बार फिर बैलेट पेपर के युग में लौटने को लेकर जो सोच सामने आ रही है और जिन पश्चिमी देशों के उदाहरण गिनाए जा रहे हैं, वो कितने व्यावहारिक हैं, ये सोचना जरूरी है। 
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