पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन रिहा हो गए हैं। इसको लेकर सियासत गर्म है। आनंद मोहन की रिहाई के विरोध में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से लेकर आईएएस एसोसिएशन तक उतर आए हैं। बसपा ने इसे नीतीश सरकार का दलित विरोधी कदम बताया है।
वहीं, भाजपा में इसे लेकर दो मत दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के कुछ नेता रिहाई का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जैसे नेता इसके समर्थन में हैं। सवाल यह है कि आखिर आनंद मोहन की रिहाई पर संग्राम क्यों छिड़ा है? बिहार में आनंद मोहन कितने ताकतवर हैं? बिहार सरकार ने अचानक कानून में बदलाव क्यों किया? आइए जानते हैं...
अभी क्यों चर्चा में आए आनंद मोहन?
बात पांच दिसंबर 1994 की है। तब बिहार के गोपालगंज में जी कृष्णैया जिलाधिकारी हुआ करते थे। कृष्णैया युवा आईएएस अधिकारी थे और तेलंगाना के महबूबनगर से थे। कृष्णैया दलित थे। वह पटना से एक बैठक करके वापस गोपालगंज लौट रहे थे। इसी वक्त माफिया कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला की शव यात्रा में उनकी कार फंस गई। छोटन की शव यात्रा में हजारों की भीड़ उमड़ी थी।
कौशलेंद्र की एक दिन पहले हत्या हो गई थी। उन दिनों राज्य में अगड़ा-पिछड़ा संघर्ष चल रहा था। एक तरफ लालू यादव थे तो दूसरी ओर आनंद मोहन थे। कौशलेंद्र शुक्ला आनंद मोहन का करीबी बताया जाता था।
बताया जाता है कि उसके अंतिम संस्कार में अचानक भीड़ आगबबूला हो गई। भीड़ ने तत्कालीन डीएम कृष्णैया पर हमला कर दिया और पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। भीड़ को उकसाने का आरोप आनंद मोहन पर लगा।
2007 में एक अदालत ने मोहन को मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि, एक साल बाद निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करने पर पटना उच्च न्यायालय द्वारा मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। पिछले 15 साल से वह बिहार की सहरसा जेल में सजा काट रहे हैं।
अब बिहार सरकार ने जेल नियमों में संशोधन कर दिया है। इस संशोधन के चलते आनंद मोहन रिहा हो गए हैं, इसी का विपक्ष के नेता विरोध कर रहे हैं।