चंद्रयान 3
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चंद्रयान-3 का लैंडर मॉड्यूल (एलएम) आज चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। इसके साथ ही भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा। पूरी दुनिया इस ऐतिहासिक पल का टकटकी लगाए इंतजार कर रही है। लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) से युक्त लैंडर मॉड्यूल शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर सॉफ्ट लैंडिंग कर सकता है।
इस बीच चंद्रयान-3 के बजट की भी चर्चा हो रही है। दरअसल इसका बजट एक सामान्य हॉलीवुड फिल्म से भी कम है। ऐसे में जानना जरूरी है कि आखिर चंद्रयान-3 क्या है? इसका बजट कितना है? बाकी दो मिशनों की लागत कितनी थी? भारत के चंद्र मिशन के सस्ते होने की वजह क्या?
चंद्रयान 3
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पहले जानते हैं कि चंद्रयान-3 क्या है?
इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का ही अगला चरण है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और परीक्षण करेगा। यह चंद्रयान-2 की तरह ही दिखता है, जिसमें एक लैंडर और एक रोवर शामिल किए गए हैं। चंद्रयान-3 का फोकस चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंड करने पर है। मिशन की सफलता के लिए नए उपकरण बनाए गए हैं। एल्गोरिदम को बेहतर किया गया है। जिन वजहों से चंद्रयान-2 मिशन चंद्रमा की सतह पर नहीं उतर पाया था, उन पर फोकस किया गया है।
मिशन ने 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा केन्द्र से उड़ान भरी और आज शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा पर उतरेगा। यह मिशन भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना देगा।
चंद्रयान
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इसका बजट कितना है?
लैंडिंग सफल होने पर भारत उपग्रह के जोखिम भरे दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बन जाएगा। हालांकि, यह अन्य देशों की तरह चंद्र मिशन पर सैकड़ों अरबों डॉलर खर्च नहीं कर रहा है। चंद्रयान-3 का अनुमानित बजट 615 करोड़ रुपये है जो भारत के सबसे किफायती अंतरिक्ष मिशनों में से एक है।
जानकारी के मुताबिक, दिसंबर 2019 में इसरो ने परियोजना की शुरुआती फंडिंग के लिए 75 करोड़ रुपये का अनुरोध किया था। इसमें से 60 करोड़ रुपये का उपयोग मशीनरी, उपकरण और अन्य पूंजीगत व्यय को पूरा करने के लिए किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, बाकी 15 करोड़ रुपये राजस्व व्यय मद के तहत मांगे गए थे।
2020 में इसरो के पूर्व प्रमुख के सिवन ने कहा था कि चंद्रयान-3 की लागत करीब 615 करोड़ रुपये है। लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल की लागत 250 करोड़ रुपये और लॉन्च सेवाओं की लागत लगभग 365 करोड़ रुपये है। ऐसा अनुमान है कि मिशन का बजट बढ़ गया है क्योंकि इसे 2021 में लॉन्च किया जाना था और इसमें दो साल की देरी हो गई है।
यह आदिपुरुष जैसी बड़े बजट की फिल्मों की तुलना में बहुत कम लागत है। दरअसल, बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों का बजट चंद्रयान-3 से कहीं ज्यादा बड़ा है। टॉम क्रूज के लेटेस्ट मिशन: इम्पॉसिबल - डेड रिकॉकिंग पार्ट वन का बजट 2,386 करोड़ रुपये था और प्रभास और कृति सेनन-स्टारर आदिपुरुष का बजट 700 करोड़ रुपये था।
चंद्रयान मिशन
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अन्य चंद्रयान मिशनों की लागत कितनी थी?
इससे पहले 22 जुलाई 2019 को चंद्रयान-2 लॉन्च किया गया था। यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर सॉफ्ट लैंडिंग की कोशिश करने वाला किसी भी देश का पहला अंतरिक्ष मिशन था। हालांकि, चंद्रयान-2 मिशन का विक्रम चंद्र लैंडर छह सितंबर को चंद्रमा पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। चंद्रयान-2 की लागत चंद्रयान-3 से भी ज्यादा है। चंद्रयान-2 की लागत 978 करोड़ रुपये थी, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर, नेविगेशन और ग्राउंड सपोर्ट नेटवर्क के लिए 603 करोड़ रुपये शामिल थे। भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) की लागत 375 करोड़ रुपये थी।
चंद्रयान-1 भारत का पहला चंद्र मिशन था, जिसे 22 अक्टूबर 2008 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था। 29 अगस्त 2009 तक यह 312 दिनों तक चालू रहा और 3,400 से अधिक चंद्र परिक्रमाएं पूरी कीं। लगभग एक साल तक तकनीकी कठिनाइयों से जूझने के बाद इससे संपर्क टूट गया। लॉन्च सर्विस समेत इसमें कुल 386 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे।
लूना-25
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अन्य देश अंतरिक्ष अभियानों पर कितना खर्च करते हैं?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की दौड़ में चंद्रयान-3 का मुकाबला रूस के लूना-25 से था। हालांकि, रूसी मिशन चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के कारण अपने लक्ष्य से चूक गया। लूना-25 पिछले 47 वर्षों में चंद्रमा पर रूस का पहला मिशन था और रूस ने इस पर अनुमानित 1,659 करोड़ रुपये खर्च किए थे। जानकारी के मुताबिक, इसमें अंतरिक्ष यान के निर्माण, प्रक्षेपण संचालन विकसित करने, मिशन नियंत्रण और बहुत कुछ का खर्च शामिल है।
जनवरी 2019 में चीन का चांग'ई-4 चंद्र मिशन चंद्रमा पर उतरा था। तब परियोजना के उप निदेशक वू यानहुआ ने दावा किया था कि मिशन की कुल लागत बहुत अधिक नहीं थी। उनके मुताबिक, लागत एक किलोमीटर मेट्रो के निर्माण के करीब है। चीन में मेट्रो की प्रति किलोमीटर लागत 568 करोड़ रुपये से 1,365 करोड़ रुपये तक होती है।
नासा अपना एक नया चंद्रमा रॉकेट स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) तैयार कर रहा है। मिशन का उद्देश्य मनुष्यों को चंद्रमा पर ले जाने की है। हालांकि, एसएलएस की लागत काफी है। रॉकेट के बूस्टर और इंजन के लिए चार अनुबंधों पर शुरू में 14 वर्षों में करीब 58,185 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अब लगभग 25 वर्षों में कम से कम 1.08 लाख करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है।
अमेरिका के आर्टेमिस की लागत 2025 तक 8.3 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। इसके लिए चंद्रमा की कक्षा में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के समान सुविधा के निर्माण की आवश्यकता है।
नासा के मावेन मार्स मिशन की अनुमानित लागत 5,566 करोड़ रुपये थी, जबकि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी मार्स एक्सप्रेस का बजट लगभग 1,349 करोड़ रुपये था। भारत का मंगलयान (मंगल ग्रह के लिए मिशन) 450 करोड़ रुपये में विकसित किया गया था।
चंद्रयान-3
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भारत के चंद्र मिशन के सस्ते होने की वजह क्या?
इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ के. सिवन ने 2018 में बताया था कि इसरो अंतरिक्ष यान के विकास के हर चरण पर कड़ी निगरानी रखता है, इसलिए एजेंसी उत्पादों की बर्बादी से बच जाती है। वहीं लॉन्च बजट को नियंत्रण में रखने के लिए भारत ने कई मिशनों के लिए पीएसएलवी का उपयोग किया है। इसके साथ ही भारत ने पिछले कुछ वर्षों में महंगे आयात की तुलना में घरेलू घटकों और प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता दी है।
चंद्रयान 3
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मिशनों के किफायती होने की यह भी एक वजह?
10 अगस्त को रूस ने लूना-25 मिशन भेजा गया था। उम्मीद जताई जा रही थी कि 21 अगस्त को यह चांद की सतह पर पहुंच जाएगा। लूना-25 सफल होता तो ऐसा पहली बार होता कि कोई मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड किया। हालांकि, यह सब कुछ हो पता इससे पहले ही मिशन चांद की सतह से टकराकर क्रैश हो गया।
दरअसल, लूना-25 एक शक्तिशाली रॉकेट पर सवार होकर 10 अगस्त को प्रक्षेपण के बाद केवल छह दिनों में चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया था। चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को लॉन्च होने के बाद चांद की कक्षा में पहुंचने में ही 22 दिन लग गए। दरअसल, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के लिए बूस्टर या कहें शक्तिशाली रॉकेट यान के साथ उड़ते हैं।
अगर आप सीधे चांद पर जाना चाहते हैं, तो आपको बड़े और शक्तिशाली रॉकेट की जरूरत होगी। इसमें ईंधन की भी अधिक आवश्यकता होती है, जिसका सीधा असर प्रोजेक्ट के बजट पर पड़ता है। यानी अगर हम चंद्रमा की दूरी सीधे पृथ्वी से तय करेंगे तो हमें ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। नासा भी ऐसा ही करता है लेकिन इसरो का चंद्र मिशन सस्ता है क्योंकि उसने चंद्रयान को सीधे चंद्रमा पर नहीं भेजा।