इस तरह की घटनाएं हमारे देश में रुक नहीं रही हैं। चिंताजनक बात यह है कि इससे देश के सिस्टम को कोई फर्क भी नहीं पड़ रहा है। 2012 में जब मेरी बेटी के साथ घटना हुई थी तो पूरे देश में धरना—प्रदर्शन हुआ था। लेकिन सब बेकार होता दिख रहा है। मामले को अदालत में सात में साल हो गए हैं। दो बार सुप्रीम कोर्ट से फैसला आ चुका है कि आरोपियों को फांसी हो। लेकिन अब तक दरिंदे जिंदा हैं। न्याय व्यवस्था की गति पर अफसोस होता है। जब भी घटना होती है तो कहा जाता है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगी सजा होगी पर यह सब कहां होता है। निर्भया के समय भी बहुत वादे हुए थे, पर अभी तक उन चार दोषियों को सजा नहीं हुई।
जिस पर गुजरती है, वही दर्द भी जानता है। आज मेरे पास बेटी नहीं केवल उसकी यादें हैं। एक तरफ तो कहा जाता है बच्चियों को पढ़ाओ, लेकिन सच्चाई यह है कि बच्चियों को छिपाकर रखने जैसे हालात हैं। हैदराबाद में बेटी काम के बाद वापस लौट रही थी। उसकी गलती क्या थी, जो उसके साथ ऐसा हुआ। दरअसल सजा न मिलने से मुजरिमों के हौसले बढ़े हुए हैं। देश में ऐसे मामलों की भरमार है, जिसमें बलात्कार करने वाले आरोपी पीड़ितों को धमकी देते हैं। पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने पर हत्या तक की कोशिश होती है। बलात्कारियों को छोड़ेंगे तो उनका हौसला बढ़ेगा। जबकि ऐसे आरोपियों को जल्द सजा मिलनी चाहिए। पीड़िताओं को समाज का सहयोग मिलना चाहिए।
फांसी होनी चाहिए। बल्कि फांसी से भी ज्यादा बड़ी कोई सजा बनानी चाहिए। हैदराबाद में जिस बेटी के साथ हुआ, उसके परिवार को नियम-कानून समझाने के बजाय आरोपियों पर कार्रवाई करनी चाहिए।
फास्ट ट्रैक को वाकई फास्ट बनाए जाने की जरूरत है। मैं 2012 से कह रही हूं कि हमें इन दरिंदों के खिलाफ एकजुट हो जाना चाहिए वरना वो ऐसे ही बलात्कार करते रहेंगे।