महाराष्ट्र में सियासी उथल-पुथल का दौर थम चुका है। एकनाथ शिंदे राज्य के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। अब सवाल ये है कि आखिर क्यों महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा ने मुख्यमंत्री का पद शिवसेना के बागी गुट के नेता एकनाथ शिंदे को सौंप दिया? आखिर क्यों देवेंद्र फडणवीस ने खुद यह पद अपने पास नहीं रखा और 2019 की वह क्या गलती थी, जिससे सीख लेते हुए भाजपा ने शिंदे गुट को सरकार चलाने के लिए समर्थन देने का फैसला किया?
विज्ञापन
2 of 6
एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस ने ली शपथ
- फोटो : Agency
क्यों एकनाथ शिंदे बने मुख्यमंत्री?
महाराष्ट्र में राजनीतिक सरगर्मियां शुरू होने के साथ ही यह तय हो गया था कि शिवसेना से जो भी विधायक बगावत कर रहे हैं, उन्होंने एकनाथ शिंदे को अपना नेता मान लिया है। पहले विधायकों का एक बड़ा समूह शिंदे के साथ गुजरात और फिर असम के गुवाहाटी रवाना हुआ। बाद में एक-एक करके कुछ और विधायक शिवसेना से टूटकर शिंदे गुट से जुड़ गए।
एकनाथ शिंदे इस वक्त निर्दलीयों को मिलाकर 50 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं। यानी इस पूरे सियासी उठापटक की शुरुआत से लेकर आखिर तक नियंत्रण सिर्फ एकनाथ शिंदे के ही हाथ में रहा।
विज्ञापन
3 of 6
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे।
- फोटो : अमर उजाला
शिवसैनिक को सीएम बनाने पर शिवसेना के समर्थन का वादा?
शिंदे गुट जिस दौरान बगावत कर रहा था और शिवसेना में वापस न लौटने की बात साफ कर चुका था। उस वक्त महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा था कि अगर उनके विधायक उनसे सामने आकर इस्तीफा मांगते हैं तो वे खुशी से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने एकनाथ शिंदे को सीएम पद का ऑफर भी दिया था। उद्धव ने कहा था कि अगर कोई शिवसैनिक मुख्यमंत्री पद पर बैठेगा तो पूरी शिवसेना उसका समर्थन करेगी।
जानकारों की मानें तो भाजपा की तरफ से शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने के फैसले ने उद्धव ठाकरे के लिए मुसीबत पैदा कर दी है। क्योंकि शिंदे एक पुराने शिवसैनिक रहे हैं और बगावत के दौरान भी अलग पार्टी बनाने की जगह खुद को असली शिवसेना करार देते रहे हैं।
भाजपा ने शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर उद्धव को उनके ही शब्दों में घेरने का भी काम किया है। इसके साथ ही शिवसेना के बचे विधायकों को भी अपनी ओर करने का प्रयास किया है। इस कदम से भाजपा उद्धव ठाकरे को शिवसेना में अलग-थलग कर देने की भी कोशिश कर रही है।
4 of 6
देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे
- फोटो : अमर उजाला
फडणवीस ने क्यों नहीं मिला सीएम पद?
चूंकि, शिवसेना को तोड़ने से लेकर नई सरकार में समर्थन तक, सत्ता की चाभी एकनाथ शिंदे के साथ ही रही, ऐसे में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद पर दावा करना काफी मुश्किल होना था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, भाजपा एनसीपी के साथ सरकार बनाने के कड़वे अनुभव को भूली नहीं है। जब चंद घंटे में सत्ता गंवानी पड़ी थी।
विज्ञापन
5 of 6
देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे (फाइल)
शिवसेना को जवाब देने के लिए भाजपा ने पद त्यागा?
राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद को इसीलिए त्यागा है ताकि वह उद्धव ठाकरे को खुली चुनौती दे सके। 2019 के चुनाव के बाद शिवसेना ने दावा किया था कि भाजपा ने ढाई साल के मुख्यमंत्री का वादा किया था।
तब फडणवीस ने कहा था कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ था और विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह उन्हें ही पीएम बनाने की बात कह रहे थे। हालांकि, शिवसेना ने पलटवार करते हुए कहा था कि सीएम पद के मोह की वजह से फडणवीस अपने वादे से मुकर रहे हैं। ऐसे में इस बार फडणवीस के सीएम पद न लेने के फैसले को शिवसेना को सीधे संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
2019 की कौन सी गलती, जिसकी वजह से भाजपा ने शिंदे को सौंपा पद?
2019 में भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन में चुनाव लड़ा। हालांकि, मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों पार्टियों के बीच ठन गई और दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया। उस दौरान भाजपा ने राकांपा के बागी नेता अजीत पवार और उनके साथी विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की। जहां फडणवीस ने खुद सीएम पद लिया तो वहीं अजीत पवार को डिप्टी सीएम का पद सौंपा।
हालांकि, उनकी यह गलती तब भारी साबित हो गई। दरअसल, राकांपा से बगावत करने के बावजूद आखिरकार शरद पवार ने भतीजे अजीत को मनाने में कामयाबी पाई। भाजपा को सत्ता से दूर रखने और उसके विरोधी दलों का गठबंधन बनाने के लिए शरद पवार किंगमेकर की भूमिका में सामने आए। समझौते के तहत राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना को मुख्यमंत्री पद मिला, जबकि महा विकास अघाड़ी गठबंधन कायम रखने के लिए बागी अजीत पवार को सरकार में डिप्टी सीएम पद दिए जाने की बात हुई। यानी अजीत पवार को बिना किसी नुकसान के ही राकांपा में वापस ले लिया गया। इसका असर यह था कि भाजपा को सरकार के दूसरे सबसे बड़े पद के बलिदान का भी कोई फायदा नहीं हुआ।