कांग्रेस ने अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर राजेश कुमार को बिहार का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। दलित समुदाय से आने वाले राजेश कुमार को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि इस बार वह बिहार में दलित-मुसलमान समीकरण पर केंद्रित राजनीति करेगी। इसका उसे चुनावी लाभ मिल सकता है। इसके पहले बिहार में राहुल गांधी के दलित समुदायों के दो बड़े कार्यक्रमों में शामिल होने से भी यही संकेत गया था कि पार्टी इस बार बिहार में दलित समीकरण साधने की कोशिश करेगी।
कुटुंबा से दो बार के विधायक राजेश कुमार के पास पिता दिलकेश्वर राम की राजनीतिक विरासत अवश्य है, लेकिन उनकी पूरे बिहार में कोई बड़ी पहचान नहीं है। दलित समुदाय के बीच भी उनकी कोई बड़ी पहचान नहीं है। ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस ने राजेश कुमार को अध्यक्ष अवश्य बना दिया है, लेकिन उसके इस कार्ड को बिहार में मजबूती से प्रचारित करने की जिम्मेदारी पार्टी के शीर्ष नेताओं पर ही रहेगी।
दलित वोटों के दावेदार कौन
बिहार में दलितों की आबादी लगभग 16 प्रतिशत है। राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 38 सीटें अनुसूचित समुदाय के लिए और दो सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। ये वोटर वर्ग किसी एक पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं है।बिहार में दलितों वोटों के सबसे बड़े दावेदार सीपीआई (एमएल), लोजपा (रामविलास पासवान) और जीतन राम मांझी की पार्टी हम है। दलितों का कुछ वोट राजद और कांग्रेस को भी मिलता है।
एनडीए की दावेदारी ज्यादा मजबूत
वर्तमान समीकरणों में बिहार में दलित वोटों पर सबसे अधिक प्रभाव एनडीए खेमे का है। केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं के सहारे भाजपा ने दलित वोटों पर पकड़ मजबूत की है। अयोध्या के राम मंदिर और सीतामढ़ी में माता जानकी के मंदिर के निर्माण से दलितों को जोड़कर पार्टी ने समाज के बीच उनकी सामाजिक स्वीकार्यता और सम्मान बढ़ाने की कोशिश की है। इसका उसे लाभ मिल रहा है। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के जरिए केंद्र सरकार ने जिन जातियों का आर्थिक सशक्तिकरण करने की कोशिश की है, उनकी बड़ी संख्या बिहार में है। भाजपा को इसका भी लाभ हो रहा है।
इसके अलावा रामविलास पासवान की विरासत संभालने वाले चिराग पासवान भी महादलितों के छः प्रतिशत वोटों पर दावेदारी रखते हैं। पिछले दिनों दलितों-महादलितों के कई बड़े कार्यक्रम करवाकर जीतन राम मांझी ने बताया है कि बिहार में दलित वोटों के बड़े दावेदार वे हैं। ऐसे में एनडीए खेमा फिलहाल दलितों पर पकड़ के मामले में आगे दिख रहा है।
कांग्रेस की उम्मीद
राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा से ही दलितों का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाते रहे हैं। बाद में दूसरे राज्यों के चुनावों से लेकर संसद तक में वे बार-बार दलितों के उत्थान की बात कर रहे हैं। वे बार-बार आरक्षण बढ़ाने का मुद्दा भी कर रहे हैं। बिहार में नौकरियों और आरक्षण का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। यदि कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे बिहार में इसी बात को पुरजोर तरीके से कहते हैं, और जनता के बीच इंडिया गठबंधन को लेकर एक लहर बनती है तो दलितों का कुछ वोट एनडीए से खिसककर इंडिया गठबंधन के पक्ष में जा सकता है। माना जा रहा है कि कांग्रेस इसी रणनीति पर चल रही है।
'बैकफायर कर सकती है ये रणनीति'
राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने कहा कि अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर राजेश कुमार को अध्यक्ष बनाने की कांग्रेस की रणनीति उसे लाभ की बजाय नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान की चौकड़ी ने बिहार में कई ऐसे काम किए हैं जिसके कारण दलित उनके साथ बना रह सकता है। वहीं, राजेश कुमार की कोई बड़ी पहचान न होने के कारण केवल दलित होने के नाम पर बिहार का दलित कांग्रेस को वोट देने लगेगा, यह दूर की कौड़ी लगती है।
धीरेंद्र कुमार कुमार के अनुसार, यदि कांग्रेस डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह को ही अध्यक्ष बनाए रखती तो उसे इसका ज्यादा लाभ मिल सकता था। बिहार का लगभग 17 फीसदी फॉरवर्ड इस समय स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। पहले भाजपा उसे अपनी पार्टी लग रही थी, लेकिन जिस तरह भाजपा ने राजद-लोजपा से आए हुए बाहरी पिछड़ों-दलितों को पार्टी के अंदर बढ़ाया है, उन्हें शीर्ष भूमिकाएं दी हैं और पूरी पार्टी की कमान उन्हीं के हाथों में सौंप दी है, बिहार के सवर्ण स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
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राजद अब सवर्णों को भी आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन सवर्णों के मन में बसा पिछले इतिहास की झलक उसे उसके पास जाने से रोक रही है। धीरेंद्र कुमार के अनुसार, लेकिन यदि कांग्रेस अध्यक्ष पद पर किसी सवर्ण को बनाए रखती तो भाजपा और एनडीए से नाराज लोगों का वह ठिकाना बन सकती थी। इसकी बिहार में काफी प्रबल संभावना बन सकती थी। हालांकि, एक दलित को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने इस अवसर को गंवा दिया है।
राजद को दबाव में लाने की भी रणनीति
कांग्रेस का दलित कार्ड राष्ट्रीय जनता दल और लालू-तेजस्वी यादव को दबाव में लाने की रणनीति भी हो सकती है। पिछले दिनों लालू यादव और तेजस्वी यादव दोनों नेताओं ने इंडिया गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस की बजाय किसी और नेता या दल (ममता बनर्जी) को देने की बात कही थी। माना जाता है कि इसके सहारे राजद नेता कांग्रेस को बिहार विधानसभा में कम सीटें देने के लिए दबाव बना रहे थे। राजद नेताओं का मानना है कि यदि बिहार में पिछली बार उन्होंने कांग्रेस को ज्यादा सीटें न दी होतीं तो पिछली बार ही तेजस्वी यादव सत्ता में आ चुके होते।
कांग्रेस नेता भी राजद के इस दांव को समझ रहे हैं। लेकिन यदि दलितों-मुसलमानों का गठजोड़ बनाने में कांग्रेस सफल रहती है और इसका मजबूत संकेत जमीन से मिलने लगता है तो राजद के लिए कांग्रेस को दबाव में रखना आसान नहीं होगा। माना जा रहा है कि कांग्रेस इसी रणनीति में है और वह राजद को दबाव में रखकर अपने लिए ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए दबाव बनाने में कोई कमी नहीं रखेगी।
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साथ लड़ेंगे, कोई मनमुटाव नहीं- राजद
राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने अमर उजाला से कहा कि कांग्रेस किसे अपनी पार्टी का अध्यक्ष बनाती है, यह उसका आंतरिक मामला है। लेकिन यह सही नहीं है कि कांग्रेस-राजद में किसी तरह का मनमुटाव है और दोनों दल एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन में सबको बोलने की आजादी है, लेकिन निर्णय सर्वसम्मति से होगा। नेतृत्व के मामले पर सभी दल बैठकर निर्णय ले सकते हैं। मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि, जहां तक बिहार की बात है, दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे और जीत हासिल करेंगे।
सब कुछ भुलाकर कांग्रेस को आई दलितों की याद- जदयू
जनता दल यूनाइटेड नेता सत्यप्रकाश मिश्रा ने अमर उजाला से बातचीत में आरोप लगाया कि कांग्रेस ने आजादी के बाद से आज तक दलितों के उत्थान के लिए कोई काम नहीं किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने प्रतीकात्मक एक-दो लोगों को छोड़कर दलितों का नेतृत्व विकसित नहीं किया। आज उसे दलितों की याद तब आ रही है जब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है।
मिश्रा ने कहा कि, जबकि महादलित आयोग बनाकर और दलित मित्रों के जरिए सरकार की हर योजना को दलितों के घर-घर पहुंचाकर नीतीश कुमार ने उनके बीच एक सम्मान हासिल किया है। कांग्रेस दलित अध्यक्ष बनाकर इस वोट बैंक में सेंधमारी करना चाहती है, लेकिन जनता पर पकड़ से दूर राजेश कुमार ऐसा कुछ भी करने में सफल नहीं होंगे।