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SC: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- विधानसभा से दोबारा पारित विधेयक राष्ट्रपति को कैसे भेज सकते हैं राज्यपाल

Mon, 10 Feb 2025 09:15 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court:राज्यपाल ने 12 विधेयकों पर अपनी सहमति नहीं दी है और इनमें से सबसे पुराना विधेयक जनवरी, 2020 से लंबित है। एक बार जब सरकार ने विशेष सत्र में विधेयकों को फिर से पारित किया तो राज्यपाल ने कुछ पुनः पारित कानूनों को पुनर्विचार के लिए राष्ट्रपति के पास भेज दिया।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा से पारित विधेयकों पर सहमति रोकने से पहले तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि की लंबी चुप्पी पर सवाल उठाया और आश्चर्य जताया कि राज्यपाल विधानसभा से पुनः पारित विधेयकों को राष्ट्रपति के पास कैसे भेज सकते हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की ओर से राज्यपाल डॉ. आरएन रवि के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

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राज्यपाल ने 12 विधेयकों पर अपनी सहमति नहीं दी है और इनमें से सबसे पुराना विधेयक जनवरी, 2020 से लंबित है। एक बार जब सरकार ने विशेष सत्र में विधेयकों को फिर से पारित किया तो राज्यपाल ने कुछ पुनः पारित कानूनों को पुनर्विचार के लिए राष्ट्रपति के पास भेज दिया। राज्यपाल के साथ विधेयकों को लेकर जारी विवाद मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है।

पीठ ने राज्यपाल की ओर से पेश हुए देश के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से कहा, राज्यपाल ने जब राज्य सरकार की ओर से भेजे गए विधेयकों पर सहमति नहीं दी तब उनके मन में निश्चित रूप से कुछ चल रहा था। हालांकि राज्यपाल ने यह नहीं बताया कि प्रस्तावित कानूनों के बारे में उन्हें क्या परेशान कर रहा था।
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जस्टिस पारदीवाला ने कहा, राज्यपाल एक या दो साल तक चुप रहते हैं। सहमति नहीं देते। फिर अचानक कहते हैं कि मैंने उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। वेंकटरमणी ने कहा कि राज्यपाल ने राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति के लिए खोज-सह-चयन समिति के गठन के बारे में अपनी आपत्तियों से राज्य को पहले ही अवगत करा दिया था। विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल ने खोज-सह-चयन समिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष के नामित व्यक्ति को शामिल करने की मांग की थी। इसके बाद पारित राज्य विधेयकों में राज्यपाल को कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया से हटाने की मांग की गई।

इस पर पीठ ने कहा, तो फिर आप विधेयकों के बारे में चुप क्यों रहे? यदि आपको आपत्तियां अप्रिय लगीं तो आपने राज्य सरकार को इसके बारे में क्यों नहीं बताया? वे संभवतः आपसे सहमत होते। चार दिनों तक चली बहस के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

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