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Jammu and Kashmir: अमित शाह के 48 घंटे, चुनावी बिगुल बजने की तैयारी, वैष्णो देवी के दर्शन समेत दो-दो जनसभाएं

सार

Jammu and Kashmir: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, चार अक्तूबर को माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद राजौरी में सुबह साढ़े 11 बजे, एक पब्लिक मीटिंग में भाग लेंगे। दोपहर बाद साढ़े चार बजे जम्मू में कई परियोजनाओं का उद्घाटन एवं शिलान्यास करेंगे। पांच अक्तूबर को केंद्रीय गृह मंत्री, सुबह दस बजे, राजभवन श्रीनगर में सिक्योरिटी रिव्यू मीटिंग करेंगे...
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Amit Shah in Jammu and Kashmir - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का जम्मू-कश्मीर दौरा बहुत अहम है। क्या ये विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने की आहट है। राजनीतिक जानकार, शाह के '48' घंटे के कार्यक्रम को बहुत खास मानकर चल रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री शाह, चार अक्तूबर को जम्मू पहुंचेंगे। जहां ने सबसे पहले वे माता वैष्णो देवी के दर्शन करेंगे। उसके बाद राजौरी में एक जनसभा को संबोधित करेंगे। इसी तरह श्रीनगर में पांच अक्तूबर को सुरक्षा पर समीक्षा बैठक लेंगे। उसके बाद बारामूला में एक जनसभा में शामिल होंगे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस दौरे पर अमित शाह, जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने की संभावनाओं को लेकर चर्चा कर सकते हैं। पिछले दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, अपनी नई पार्टी बना चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में गुर्जर मुस्लिम समुदाय के 'गुलाम अली' को भाजपा ने राज्यसभा में पहुंचा दिया है। ऐसे में अब शाह के दौरे को अहम माना जा रहा है।

माता के दर्शन से शुरू होगा शाह का दौरा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, चार अक्तूबर को माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद राजौरी में सुबह साढ़े 11 बजे, एक पब्लिक मीटिंग में भाग लेंगे। दोपहर बाद साढ़े चार बजे जम्मू में कई परियोजनाओं का उद्घाटन एवं शिलान्यास करेंगे। पांच अक्तूबर को केंद्रीय गृह मंत्री, सुबह दस बजे, राजभवन श्रीनगर में सिक्योरिटी रिव्यू मीटिंग करेंगे। उसके बाद साढ़े 11 बजे बारामूला में उनकी पब्लिक मीटिंग रखी गई है। इसके बाद श्रीनगर में वे कई परियोजनाओं का शिलान्यास एवं उद्घाटन करेंगे। चूंकि गृह मंत्री के इस कार्यक्रम में दो पब्लिक मीटिंग भी हैं, इसलिए उनके दौरे को चुनाव की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव से पहले, गुलाम अली को राज्यसभा में भेजना, इसे भाजपा की रणनीति का ही एक हिस्सा माना गया था। पार्टी के जानकारों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने में गुलाम अली बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। राज्य में गुर्जर मुस्लिम बक्करवाल जैसे पहाड़ी लोगों का विधानसभा में प्रतिनिधित्व न के बराबर रहा है। गुलाम अली के राज्यसभा में जाने के बाद अब ये समुदाय खुद को चुनावी प्रक्रिया से दूर महसूस नहीं करेंगे।

राजौरी में शाह की जनसभा का कुछ मतलब है

राजौरी और पुंछ में गुर्जर बक्करवाल समुदाय के लोगों की बड़ी संख्या है। जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में नौ सीटें अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए आरक्षित की गई हैं। इनमें से छह सीट जम्मू में तो तीन सीट, कश्मीर क्षेत्र में हैं। गुर्जर और पहाड़ी जैसे कई समुदाय, जो खुद को विकास रेखा से अभी तक दूर मान रहे थे, अब वे खुश हैं। गुर्जर बक्करवाल समुदाय को कट्टर राष्ट्रवादी बताया जाता है। कारगिल युद्ध में इस बात का प्रमाण मिल चुका है। अमित शाह, राजौरी में जिस जनसभा को संबोधित करेंगे, उसमें गुर्जर बक्करवाल समुदाय के लोग, बड़ी संख्या में शामिल हो सकते हैं। यूं भी कहा जा सकता है कि शाह इस जनसभा के जरिए गुलाम अली फैक्टर के प्रभाव को भी जांच सकेंगे। हालांकि राष्ट्रवाद के मोर्चे पर 'हरे रुमाल और पाकिस्तानी नमक' वाली सियासत का गुलाम अली ने सदैव विरोध किया है। जब घाटी में सार्वजनिक तौर से कोई व्यक्ति, भाजपा के साथ चलने को तैयार नहीं था, तब गुलाम अली ने ही भाजपा की डोर मजबूती से पकड़ रखी थी। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान की घुसपैठ को सबसे पहले गुर्जर बक्करवाल समुदाय के लोगों ने ही देखा था। उन्होंने सही जगह तक सूचना भी पहुंचाई। यह समुदाय, भारतीय सेना की इंटेलिजेंस में 'आंख और कान' साबित हुआ है।

भाजपा के लिए मददगार साबित हो सकते हैं गुलाम अली

जम्मू कश्मीर परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में नौ सीटें अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए आरक्षित की गई हैं। इनमें से छह सीट जम्मू में हैं, बाकी की तीन सीट, कश्मीर क्षेत्र में आती हैं। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, कश्मीर में 68 लाख से ज्यादा मुस्लिम हैं। अगर इसे प्रतिशत में देखें तो यह आंकड़ा करीब 96 फीसदी है। जम्मू क्षेत्र में कुल आबादी की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार, वह संख्या लगभग 54 लाख है। इनमें 34 लाख हिंदू हैं। यहां पर भी 35 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है। पुंछ एवं राजौरी इलाके, जम्मू संभाग के अंतर्गत आते हैं। यहां पर गुज्जर मुस्लिम एवं बक्करवाल बड़ी तादाद में रहते हैं। ये लोग अनुसूचित जनजाति में शामिल हैं। अभी तक यहां के लोगों को कोई खास पहचान नहीं मिली थी। तीन दशक बाद इन लोगों को विधानसभा में प्रतिनिधित्व का अवसर मिला है। पुंछ और राजौरी में अब एसटी समुदाय के लिए पांच सीट आरक्षित हो गई हैं। इनकी संख्या 14 लाख से अधिक है। गुलाम अली का राज्यसभा में पहुंचना और विधानसभा सीट आरक्षित होना, भाजपा के लिए फायदे का सौदा बन सकता है।

जम्मू कश्मीर में भाजपा, यूं बैठा रही समीकरण

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके गुलाम नबी आजाद ने अब खुद की पार्टी बना ली है। उसे डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी (डीएपी) का नाम दिया गया है। उन्हें पार्टी का अध्यक्ष भी चुना गया है। आजाद ने 26 अगस्त को कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी। पूर्व डिप्टी सीएम सहित दर्जनों पूर्व मंत्रियों, विधायकों एवं प्रमुख नेता उनकी पार्टी में शामिल हुए हैं। भाजपा, गुलाम नबी की पार्टी में अपना फायदा देख रही है। चूंकि पीएम मोदी के साथ गुलाम नबी आजाद की नजदीकियां जगजाहिर हैं, इसलिए चुनाव के बाद गठजोड़ की किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। गुलाम अली के जरिए भाजपा, एससी और एसटी सीटों पर बढ़त ले सकती है। अभी तक नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी इनके वोटों के लिए जोर लगाते थे। कांग्रेस भी इन पर अपना हक जताती रही है। अभी तक भाजपा 32 सीटों के आसपास रही है। 2014 के विधानसभा चुनाव में पीडीपी को 28 और भाजपा को 25 सीटें मिली थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 15, कांग्रेस 12 और अन्य के खाते में 9 सीटें गई थी। अब भाजपा को 35 से अधिक सीट मिल सकती हैं। कांग्रेस व एनसी के नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। गुलाम नबी आजाद के खेमें में भले ही कांग्रेस के हारे हुए नेता ज्यादा हैं, लेकिन वे जनता के लिए परिचित हैं। चुनाव के बाद डीएपी व 'अपनी पार्टी' भाजपा के पक्ष में जा सकती है।

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