चीन के हुबई प्रांत स्थित वुहान के जिन यिन तान अस्पताल में 03 फरवरी से 199 कोरोना संक्रमित मरीजों पर अध्ययन शुरू हुआ। 199 में 120 पुरूष और 79 महिला मरीज शामिल थीं। इन सभी मरीजों की औसत आयु 58 वर्ष थी। इनमें गर्भवती महिला शामिल नहीं है। 199 में से 23 को डायबिटीज, 13 को कार्डियोवास्कुलर डिजीज और छह लोगों को कैंसर की बीमारी थी। 182 लोगों में बुखार, 37 लोगों में सांस लेने की दिक्कत और दो मरीजों को ब्लड प्रैशर की शिकायत थी।
ऐसे शुरू हुआ अध्ययन
करीब 20 से ज्यादा डॉक्टरों ने 14 दिन तक 99 और 100 मरीजों को दो समूह में आइसोलेशन पर रखा और उनमें से एक (99) समूह को लोपिनाविर 400 एमजी और रिटोनाविर 100 एमजी की डोज दिन में दो बार दी गई। पहले समूह में भर्ती 99 में से पांच मरीजों को डोज नहीं दे सके, क्योंकि भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर ही तीन मरीजों की मौत हो गई। जबकि अन्य दो मरीजों को डोज नहीं दी जा सकती थी। इसीलिए 94 मरीजों को ही ये उपचार दिया गया। जबकि दूसरे समूह (100) को स्टैंडर्ड केयर में रखा गया।
28 दिन में पांच बार लिए सैंपल
प्रशिक्षित नर्सों के जरिए हर दिन इनकी निगरानी की जा रही थी। डोज देने से पहले सैंपल लेने के बाद पांचवे, 10वें, 14, 21 और 28 दिन तक इनके सैंपल लिए गए। इन सैंपल की जांच चीन की ही टेडी क्लिनिकल रिसर्च लेबोरेटरी में जांचा गया।
ये निकले रिसर्च के परिणाम
अध्ययन में ये सामने आया कि गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को कोविड-19 संक्रमण होने पर लोपिनाविर और रिटोनाविर दवा का असर नहीं होता है। नैदानिक उपचार में इन दवाओं के इस्तेमाल से कोई तेजी नहीं आई। न ही गंभीर मरीजों में मृत्यु की आशंका को कम किया। साथ ही बुखार भी कम नहीं हुआ। अध्ययन के अंत में भी जिन मरीजों को ये दवाएं दी गईं। 28 दिन बाद उनमें से 40 फीसदी मरीजों को बुखार की शिकायत थी। इनके अनुसार गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के कोरोना संक्रमित होने के बाद उनके शरीर में वायरस 20 से 37 दिन तक रह सकता है।