यूपी सरकार ने कहा था कि वर्षों से लंबित इस मामले में मुस्लिम पक्षकार वर्ष 1994 में इस्माइल फारुखी मामले में दिए फैसले में लिखी उस टिप्पणी पर अब पुनर्विचार करने की गुहार कर ही है जिसमें कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पढना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। करीब एक सदी से इस विवाद के अंतिम रूप से निपटारे का इंतजार हो रहा है। उक्त टिप्पणी वर्ष 1994 में की थी लेकिन अब तक इसे लेकर कोई याचिका दायर की गई और न ही मौजूदा दायर अपील में की गई।
इससे पहले सेंट्रल सिया वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एसएन सिंह ने कहा कि बाबरी मस्जिद मीर बाकी ने बनवाया था और मीर बाकी शिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित भूमि में से एक हिस्सा मुस्लिम पक्षकार को दिया गया है। ऐसे में वह उसकेअसली दावेदार हैं और वह चाहता है इस हिस्से को राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू को दे दिया जाए। ऐसा करना देश की अखंडता, एकता, भाईचारे और शांति व्यवस्था केलिए जरूरी है। साथ ही शिया वक्फ बोर्ड ने मुस्लिम पक्षकारों द्वारा इस्माइल फारुखी केफैसले में की गई टिप्पणी पर पुनर्विचार करने की मांग को भी अुनचित बताया।
वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से कहा गया कि 1946 में ही यह निर्णय हो गया था कि उस जमीन पर मालिकाना हक सुन्नी वक्फ बोर्ड का है। शिया वक्फ बोर्ड ने पिछले वर्ष 1946 केफैसले को चुनौती दी है। साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से कहा गया कि इस मामले में शिया बोर्ड को कोई लोकस नहीं है, लिहाजा वह उनकी बातों का जवाब नहीं देना चाहते। अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।