दिल्ली के इलाके मंजनू का टीला इलाका, जहां पर पाकिस्तान से आए करीब 140 परिवार रहते हैं, आरती भी उन्हीं में से एक है। उसका पहले एक बेटा है, जिसका नाम लोकेश है। आरती बताती है कि हम 2011 में तीर्थयात्रा के नाम पर वीजा लेकर भारत आए थे। ऐसा भी नहीं है कि अब वहां पर कोई हिंदू नहीं है। पाकिस्तान के सिंध हैदराबाद में बहुत से हिंदू परिवार रहते हैं। वे चाहते हैं कि उन्हें भी किसी तरह भारत में जाने का अवसर मिल जाए। हमारे कई रिश्तेदार अभी वहीं पर हैं। हमें यहां आठ साल से ये कच्चा ठिकाना सिर छुपाने के लिए मिला है।
सुविधाएं न हों, लेकिन यही बहुत है कि 'अमन चैन और अपनों' के बीच सांस तो ले पा रहे हैं। बेटी के जन्म के बाद कई लोगों ने कहा, अपने मुताबिक कोई नाम रख लो। तभी मुझे पता चला कि देश में हमारी नागरिकता को लेकर कुछ चल रहा है। मैंने अपने बड़ों से बातचीत की, उन्होंने विस्तार से बताया कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक का मामला संसद में है। अगर यह पास हो जाता है तो हमारे ऊपर से पाकिस्तानी होने का ठप्पा मिट जाएगा और हम गौरव से दुनिया को बता सकेंगे कि हम भारतीय हैं। बस यहीं से दिमाग में आया कि बेटी का नाम 'नागरिकता' रख दिया जाए। हमारी इस बस्ती में रहने वाले लोगों को जब यह पता चला तो उन्होंने हमें बधाई दी।
एक सवाल के जवाब में आरती हंस पड़ती हैं। उसकी बेटी किसी दूसरी महिला की गोद में थी। वजह, आरती को बैठने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए वह लेटकर ही बात कर रही थी। उसने उल्टा एक सवाल हम पर ही दाग दिया। बोली, आप कौन सी 'नागरिकता' की बात कर रहे हैं। वैसे तो दोनों 'नागरिकता' मेरी हैं। एक मुझे मिल गई है और जबकि दूसरी का इंतजार है। उम्मीद है कि देर-सवेर वह नागरिकता भी मुझे मिल जाएगी।