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हिंदी पत्रकारिता दिवस आज: क्या है इसका इतिहास, कानपुर के पत्रकार ने बंगाल से क्यों शुरू किया 'उदन्त मार्तण्ड'

Tue, 30 May 2023 01:53 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हिंदी भाषा में 'उदन्त मार्तण्ड' के नाम से पहला समाचार पत्र आज ही दिन यानी 30 मई 1826 में निकाला गया था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इसे कलकत्ता से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक भी वे खुद थे। 
 
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उदन्त मार्तण्ड - फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
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आज यानी 30 मई का दिन हिंदी पत्रकारिता के लिए खास है। इस दिन को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिस पत्रकारिता को आज हम देख रहे हैं वह अपने साथ एक लंबा इतिहास समेटे हुए है। हिंदी पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास में कानपुर के पंडित जुगल किशोर शुक्ल के 'उदन्त मार्तण्ड' अखबार का अहम योगदान है। 
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हिंदी पत्रकारिता दिवस - फोटो : अमर उजाला
ऐसे शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता 
हिंदी भाषा में 'उदन्त मार्तण्ड' के नाम से पहला समाचार पत्र आज ही दिन यानी 30 मई 1826 में निकाला गया था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इसे कलकत्ता से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक भी वे खुद थे। 

उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है ‘समाचार-सूर्य‘। अपने नाम के अनुरूप ही उदन्त मार्तण्ड हिंदी की समाचार दुनिया के सूर्य के समान ही था। यह पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था जब हिंदी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की आवश्यकता महसूस हो रही थी।  

हिंदुस्तानियों के हक के लिए उठानी थी आवाज 
जुगल किशोर शुक्ल वकील भी थे और कानपुर के रहने वाले थे। लेकिन उस समय औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में उन्होंने परतंत्र भारत की राजधानी कलकत्ता को अपनी कर्मस्थली बनाया। परतंत्र भारत में हिंदुस्तानियों के हक की बात करना बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था। इसी के लिए उन्होंने कलकत्ता के बड़ा बाजार इलाके में अमर तल्ला लेन, कोलूटोला से साप्ताहिक 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन शुरू किया। यह साप्ताहिक अखबार हर हफ्ते मंगलवार को पाठकों तक पहुंचता था।

 कलकत्ता में अंग्रजी शासकों की भाषा अंग्रेजी के बाद बांग्ला और उर्दू का प्रभाव था। इसलिए उस समय अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी में कई समाचार पत्र निकलते थे। हिंदी भाषा का एक भी समाचार पत्र मौजूद नहीं था। 1818-19 में कलकत्ता स्कूल बुक के बांग्ला समाचार पत्र ‘समाचार दर्पण’ में कुछ हिस्से हिंदी में भी होते थे।

हिंदी पत्रकारिता दिवस की शुरूआत उदन्त मार्तण्ड के प्रथम प्रकाशन से हुई - फोटो : File
अखबार में ही बताया था उदन्त मार्तण्ड के शुरू करने का उद्देश्य 
उदन्त मार्तण्ड के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए जुगल किशोर शुक्ल ने लिखा था- 'यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हेत जो, आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाली में जो समाचार का कागज छपता है उसका उन बोलियों को जान्ने ओ समझने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं।'

अखबार के शुरू होते ही सामने आईं कई चुनौतियां
'उदन्त मार्तण्ड' एक साहसिक प्रयोग था। इस साप्ताहिक समाचार पत्र के पहले अंक की 500 प्रतियां छपीं। हिंदी भाषी पाठकों की कमी की वजह से उसे ज्यादा पाठक नहीं मिल सके। इसके अलावा हिंदी भाषी राज्यों से दूर होने के कारण उन्हें समाचार पत्र डाक द्वारा भेजना पड़ता था। डाक दरें बहुत ज्यादा होने की वजह से इसे हिंदी भाषी राज्यों में भेजना भी आर्थिक रूप से महंगा सौदा हो गया था।

पंडित जुगल किशोर ने सरकार ने बहुत अनुरोध किया कि वे डाक दरों में कुछ रियायत दें जिससे हिंदी भाषी प्रदेशों में पाठकों तक समाचार पत्र भेजा जा सके, लेकिन ब्रिटिश सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई। अलबत्ता, किसी भी सरकारी विभाग ने 'उदन्त मार्तण्ड' की एक भी प्रति खरीदने पर भी रजामंदी नहीं दी।

'अस्तांचल को जात है उदन्त मार्तण्ड' वाले अंक के साथ अस्त हुआ हिंदी पत्रकारिता का सूरज 
पैसों की तंगी की वजह से 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन बहुत दिनों तक नहीं हो सका और आखिरकार चार दिसम्बर 1826 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया। शुक्ल को 79 अंक निकालने के बाद अंतिम अंक में लिखना पड़ा कि, ‘आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।’ लेकिन डेढ साल में ही डूबने वाले इस ‘‘मार्तण्ड’’ ने जो रोशनी भविष्य की पीढ़ी को दिखाई उसका लाभ स्वाधीनता आन्दोलन को भी मिला। बंद होने से पहले इसने हिंदी पत्रकारिता के सूर्य को उदित कर दिया था जो आज भी देदीप्यमान है।

'प्रताप' ने बढ़ाई अंग्रेजों की चिंता
पत्रकारिता में क्रांतिकारिता का रंग गणेश शंकर विद्यार्थी ने भरा था। उन्होंने उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से 9 नवंबर 1913 को 16 पृष्ठ का ‘प्रताप’ समाचार पत्र शुरू किया था। यह काम शिव नारायण मिश्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, नारायण प्रसाद अरोड़ा और कोरोनेशन प्रेस के मालिक यशोदा नंदन ने मिलकर किया था। चारों ने इसके लिए सौ-सौ रुपये की पूंजी लगाई थी। पहले साल से पृष्ठों की वृद्धि का सिलसिला बढ़ा तो फिर बढ़ता ही रहा। कुछ ही दिन बाद यशोदा नंदन और नारायण प्रसाद अरोड़ा अलग हो गए। शिव नारायण मिश्र और गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ को अपनी कर्मभूमि बना लिया। विद्यार्थी जी के समाचार पत्र प्रताप से क्रांतिकारियों को काफी बल मिला। 

पत्रकारिता के कर्णधार
गणेश शंकर विद्यार्थी
झंडा गीत के लेखक श्याम लाल गुप्त पार्षद 
बाल कृष्ण शर्मा नवीन
महावीर प्रसाद द्विवेदी
हसरत मोहानी जिन्होंने साहित्य के जरिए अंग्रेजों पर चलाई कलम
रमा शंकर अवस्थी, वर्तमान अखबार के संपादक

अंग्रेजों ने इन पत्र-पत्रिकाओं को किया था जब्त
भयंकर, चंद्रहास, अछूत सेवक, चित्रकूट आश्रम, लाल झंडा, वनस्पति, मजदूर ये सभी ऐसी पत्र व पत्रिकाएं हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने जब्त कर जुर्माना वसूला था। 
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20वीं शताब्दी के अखबार
19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में हिंदी के अनेक दैनिक समाचार पत्र निकले जिनमें हिन्दुस्तान, भारतोदय, भारतमित्र, भारत जीवन, अभ्युदय, विश्वमित्र, आज, प्रताप, विजय, अर्जुन आदि प्रमुख हैं। 20वीं शताब्दी के चौथे-पांचवे दशकों में अमर उजाला, आर्यावर्त, नवभारत टाइम्स, नई दुनिया, जागरण, पंजाब केसरी, नव भारत आदि प्रमुख हिंदी दैनिक समाचार पत्र सामने आए।
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