हिंदी भाषा का प्रभाव और महत्व इतना प्रबल रहा है कि दुनिया भर के विभिन्न देशों में लोगों ने इसका अध्ययन शुरू कर दिया है। यह बात न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की रजनी भार्गव ने कही। उन्होंने हिंदी भाषा के प्रति अप्रवासी लेखकों के योगदान के संदर्भ में कहा- 'भारतीय मूल के लोग ( जो भारत से आए यानि प्रथम पीढ़ी के लोग) साहित्य लेखन में ज्यादा रुचि लेते हैं, लेकिन आज की पीढ़ी (जो युवा पीढ़ी विदेशों में ही जन्म लेकर पली-बढ़ी) में साहित्य लेखन के प्रति रुझान बहुत कम है। हालांकि, हम लोग उसे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। अगर आज की पीढ़ी के लोग हिंदी में रुचि लें, तब कहा जाएगा कि हिंदी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है।'
भाषा को अस्मिता से जोड़ते हुए रजनी ने कहा, 'अपनी पहचान के लिए हिंदी को जानना बहुत जरूरी है। हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए अंग्रेजी शब्दों को लेना बहुत जरूरी नहीं है। बल्कि अवधी, ब्रज और अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों से शब्द लेकर हिंदी को समृद्ध बनाएं। अंग्रेजी की पहचान एक विदेशी भाषा के रूप में होनी चाहिए। जिस तरह चीन, स्पेन और रूस में चीनी, स्पेनिश, रूसी आदि भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, उसी तरह से भारत में हिंदी को 11वीं या 12 वीं तक अनिवार्य करना चाहिए। रजनी ने हिंदी माध्यम में पढ़ाई की अनिवार्यता पर जोर दिया और यह भी कहा कि तकनीक ने हिंदी को और बढ़ाया है और लोग साहित्य पढ़ रहे हैं।
रजनी, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी (एनवाईयू) में लेक्चरर हैं और हिंदी पढ़ाती हैं। वह एक एसीटीएफएल (ACTFL) प्रमाणित परीक्षक हैं और मूल्यांकन समन्वयक के रूप में कार्य करती हैं। वह स्टारटॉक (STARTALK) की समन्वयक और भाषा विशेषज्ञ के साथ-साथ हिंदी कवयित्री भी हैं, जिनके आलेख पुस्तकों, प्रिंट और वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। उन्होंने कई कविता सम्मेलनों, भाषा शिक्षण सम्मेलनों व कार्यशालाओं में हिस्सा लिया है।
आज दुनियाभर में हिंदी में कार्यक्रम हो रहे हैं। लोग हिंदी लिख-पढ़ रहे हैं। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय कैलिफोर्निया से जुड़ी सोनिया शर्मा ने अंग्रेजी के अधिक उपयोग के विषय में कहा कि यह उपनिवेशवाद का एक अवशेष है। अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी को लेकर लोगों में हीन भावना बनने लगती है, जो सही नहीं है। हिंदी बोलना, लिखना-पढ़ना और पढ़ाना आजाद भारत का प्रतीक है, लेकिन लोगों में एक झिझक है। दरअसल, अंग्रेजी वैश्विक संपर्क, रोजगार और इंटरनेट की आवश्कता है, शायद इसलिए। हर भाषा का एक महत्वपूर्ण और सुंदर स्थान है। हिंदी की छवि बेहतर रखनी पड़ेगी।
भाषा के मिलावट के संदर्भ में सोनिया ने कहा, 'इंटरनेट और सार्वजनिक मंचों पर अधिक से अधिक सहज हिंदी के शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। हिंग्लिश कोई दूसरी भाषा नहीं है लेकिन अगर अंग्रेजी से ज्यादा शब्द आएंगे तो हिंदी अपना अस्तित्व खो देगी। हिंदी में सोचने-लिखने-बोलने की जरूरत है। अंग्रेजी मस्तिष्क की भाषा है, जबकि हिंदी हमारे दिल की भाषा है।'
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में हिंदी के 70 से अधिक शब्द आ गए हैं तो हिंदी को लेकर युवाओं को घबराने की आवश्यकता नहीं है। युवाओं को हिंदी से जोड़ने के लिए सांस्कृतिक मूल्यों के छोटे-छोटे वीडियो बनाने चाहिए। इससे युवाओं को अपनी विरासत से संबंधों का पता चलेगा और वे इससे जुड़ेंगे। अपने आप को नकारना छोड़ें और अपनी आत्मा की सुनें।
सोनिया पिछले 20 वर्षों से अमेरिका के विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा पढ़ा रही हैं। वह अमेरिकी और भारतीय-अमेरिकी छात्रों को पढ़ाती हैं। वह न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय और यूसी बर्कले में हिंदी की प्राध्यापिका रहने के बाद अमेरिका के रक्षा विभाग में हिंदी की प्रोफेसर रह चुकी हैं। अब वह कैलिफोर्निया के स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका हैं।
डॉ. हाइंस वर्नर वेस्लर ने अपने वक्तव्य में हिंदी के विस्तार पर चर्चा की। उन्होंने कहा, आज के समय में दुनिया के कई देशों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। यह दशकों पुरानी परंपरा है। आजादी से पहले केंद्रबिंदु संस्कृत होता था। ऐसा भी कहा जाता है कि लैटिन, ग्रीक और संस्कृत का अंदरूनी संबंध है। छात्रों की संख्या कम है, लेकिन प्रवासी समाज भी आगे आ रहा है। वे अपनी पहचान के लिए भारतीय भाषा की खोज में आते हैं। योग या बॉलीवुड फिल्में अथवा शादी जैसे कारण हैं कि लोग हिंदी की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्होंने हिंदी में नौकरी की समस्या की ओर भी इशारा किया। चूंकि भारत का महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता जा रहा है, इसलिए सांस्कृतिक-आर्थिक-सामाजिक परिप्रेक्ष्य में हिंदी का विस्तार बहुत जरूरी है।
आधुनिकता में भाषा के संदर्भ जैसे विषय की चर्चा करते हुए डॉ. हाइंस ने कहा, 'दक्षिण एशिया में अंग्रेजी को आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है, जो सही नहीं है। इंटरनेट पर अलग-अलग जुबानों के शब्दों के साथ-साथ हिंदी के शब्द भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। आधुनिकता हर जुबान के अंदर किसी तरह से निहित है। हिंदुस्तान के लोग और भी जुबानें सीखें, इससे भारत आगे बढ़ेगा।
हिंदी में अन्य भाषाओं से आए शब्दों के सवाल पर उन्होंने कहा कि भाषा सिर्फ संपर्क का माध्यम नहीं है, वह अपने आप में एक खजाना है। अंग्रेजी में लैटिन इत्यादि भाषाओं से शब्द आए हैं तो मिलावट से भाषा को कोई खतरा नहीं है। अगर हिंदी को वैश्विक भाषा बनाना है तो हिंदी को भारतीय समाज से बाहर भी निकलने की इतनी जरूरत है कि वह संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन जाए और सभी उससे जुड़ जाएं। एक विदेशी भाषा के रूप में हिंदी ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई जाए।
हीनता की भावना की जरूरत बिल्कुल नहीं है। अनुवाद पर जोर देते हुए डॉ. हाइंस ने कहा, 'अंतरराष्ट्रीय स्तर हिंदी का उपयोग बढ़ना चाहिए, इससे पूरे दुनियाभर में द्विभाषिक अनुवादक मिलेंगे। हिंदी से दूसरी भाषाओं में अनुवाद होने चाहिए और पूरी दुनिया की भाषा से हिंदी में भी अनुवाद जरूरी है और ऐसा हो भी रहा है। हिंदी में दूसरी भाषाओं के विपुल साहित्य उपलब्ध है।' उन्होंने सुषुम बेदी के उपन्यास 'हवन' को पढ़ने पर जोर दिया।
डॉ. हाइंस वर्नर वेस्लर आधुनिक दक्षिण एशियाई भाषाओं पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ इंडोलॉजी के प्रोफेसर हैं। वह संस्कृतियों, दक्षिण एशियाई भाषा विज्ञान और भाषाशास्त्र में शिक्षण और अनुसंधान की पुरानी परंपरा को जारी रखे हैं। उनकी पृष्ठभूमि जर्मन शास्त्रीय इंडोलॉजी में है, लेकिन कई वर्षों से उनका व्यक्तिगत ध्यान भारत और पाकिस्तान में हिंदी-उर्दू साहित्य, सांस्कृतिक इतिहास, धर्म और समाज पर रहा है। हिंदी में योगदान के लिए उन्हें दो पुरस्कार विश्व हिंदी सम्मान (2015) और जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार 2018 भी मिल चुके हैं।
बता दें कि हिंदी के गौरव को बढ़ाने और उसकी आन-बान-शान लौटाने के मकसद से अमर उजाला ने कई वर्ष पहले 'हिंदी हैं हम' अभियान की शुरुआत की थी। इसके तहत लगातार सेमिनार-वेबिनार और काव्य कैफे समेत तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साथ ही, हिंदी की प्रगति के क्षेत्र में कार्य करने वालों को समय-समय पर पुरस्कृत भी किया जाता है।