अमेरिका में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड डिलेसी व डेनमार्क में कोपेनहेगेन विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर एल्मर जोसेफ रेनर ने कहा है कि हिंदी का वैश्विक स्तर पर विस्तार हो रहा है। लेकिन, हिंदी पर ज्यादा निवेश किए जाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, हिंदी को पढ़ने, हिंदी साहित्य को लिखने व प्रकाशित करने के प्रयास को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, हिंदी भाषियों को अपनी ताकत को समझना चाहिए और हिंदी को अपने पर गर्व करना चाहिए।
प्रो. रिचर्ड व प्रो. एल्मर शुक्रवार शाम अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत अंतरराष्ट्रीय वेबिनार ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी की भूमिका’ विषय पर चर्चा में हिस्सा ले रहे थे। प्रो. रिचर्ड कहते हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार की स्थापना से हिंदी के प्रति अंतरराष्ट्रीय रुझान बढ़ाया जा सकता है।
रिचर्ड के मुताबिक विभिन्न भाषाओं की फिल्मों के जरिये दर्शकों के विशेष वर्ग के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का पता चलता है। उन्होंने प्रेमचंद से लेकर यशपाल, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश, मैत्रेयी पुष्पा, अजय नावरिया, गीतांजलि श्री व नीलोत्पल मृणाल तक के लेखन का जिक्र किया। उन्होंने कहा, काव्य क्षेत्र में हरिवंशराय बच्चन की कविताएं प्रिय हैं।
स्थानीय भाषा और बोलियों का भी विकास होना चाहिए
प्रो. रिचर्ड कहते हैं, यह सुनकर दुख होता है कि हिंदुस्तान में लोग हिंदी के प्रति निराशा प्रकट करते हैं। जबकि इसका कोई कारण नहीं है। उन्होंने कहा, भाषा के विकास के लिए जरूरी है कि हिंदी में अधिक निवेश किया जाए। लोग अच्छा लिखते रहें और उसके प्रकाशन की भी कोशिश करें। उन्होंने कहा, अंग्रेजी भी आनी चाहिए। कुमायूं यात्रा का जिक्र करते हुए रिचर्ड ने कहा, स्थानीय भाषा व बोलियों का भी विकास होना चाहिए। मैंने देखा कि लोग कुमायूंनी में भी लिख रहे हैं।
हिंदी ही मेरा जीवन : प्रो. रिचर्ड
प्रो. रिचर्ड बताते हैं कि पहली बार हिंदुस्तान गया, तब हिंदी नहीं आती थी। लोगों से ठीक से जुड़ नहीं पाया। स्वदेश लौटकर हिंदी सीखी। आॅस्ट्रेलियन सरकार की छात्रवृत्ति पर भारत आया तो दिल्ली व भीमताल रहा। लोगों को जानने- समझने का अवसर मिला। आगे, हिंदी में पीएचडी की उपाधि ली।
आस्ट्रेलिया में पढ़ाने का मौका मिला। उन्होंने कहा, हिंदी पढ़ाने से बहुत आनंद मिलता है। अब यह शौक जूनून के हद तक पहुंच गया है। अब तो और कुछ नहीं कर सकता, अब यही मेरा जीवन है। लोगों को हिंदी सीखने के प्रति प्रेरित करना मेरा लक्ष्य है। उन्होंने कहा, लोगों की जीवनशैली और उनके रहन-सहन को जानने के लिए उनकी भाषा में ही संवाद होना चाहिए।
हिंदी क्षेत्रीय भाषा नहीं, उससे खुलते हैं कई बड़े द्वार : एल्मर
एल्मर जोसेफ रेनर ने कहा- भारत को जानने को लेकर हमेशा रुचि रही है। स्कूल के दिनों से संस्कृत साहित्य का आकर्षण रहा और भारतीयता के प्रति जिज्ञासा बढ़ी। भाषा विज्ञान की पढ़ाई भी की। पढ़ाई के दौरान इंटर्नशिप का मौका मिला, तो भारत को चुना, उसकी तैयारी के लिए हिंदी सीखी।
उन्होंने कहा, हिंदी के पीछे विशाल दुनिया है, हिंदी कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं है, उसके कई बड़े द्वार हैं जो दुनिया की तरफ खुलते हैं। संस्कृत और उर्दू से हिंदी समृद्ध हुई है। उन्होंने मैथिली भी सीखी। भाषा चयन के मनोविज्ञान पर एल्मर कहते हैं यदि सबसे पहले अपनी भाषा से अनुराग हो, तो दुनिया की किसी भी भाषा को सीखा जा सकता है।
मैं अपनी भाषा में ही हिंदी सिखाता हूं। उन्होंने कहा, तकनीक ने भाषा के विकास में बड़ी भूमिका निभाई है। तकनीक के चलते ही दुनिया के कोने-कोने से जुड़कर बात कर पा रहे हैं। समाज की उन्नति से ही भाषा का विकास होगा।
भाषा व साहित्य के क्षेत्र में अधिक शोध होने चाहिए, शिक्षण पद्धतियां और विकसित होनी चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि संवाद चलते रहना चाहिए। एल्मर का मानना है, हिंदी के प्रति यदि आकर्षण बढ़ाना है तो हिंदी समाज के आकर्षण को बढ़ाना होगा।
20 साल पहले जब हिंदी सीखना-पढ़ना शुरू किया तब कक्षा में अमर उजाला का असाइनमेंट मिला था। अमर उजाला से रिश्ता काफी पुराना है। एल्मर कहते हैं- प्रकृतिवादी साहित्य मुझे प्रभावित करता है जो समाज को नई दिशा देता है।