युनिसेफ की कार्यशाला में भाग लेते प्रतिभागी
सेहत की बात हो या टीकाकरण का सवाल। समाज में इन विषयों से जुड़ी भ्रांतियां और मिथक बहुत हैं। लेकिन, अगर हेल्थ रिपोर्टर सेहत और इलाज से जुड़ी अपनी खबर को कुछ कसौटियों पर अच्छे से कस लें तो लोगों तक सही और वैज्ञानिक रूप से प्रामाणिक जानकारी पहुंच जाएगी। इससे अलग-अलग समाज में फैले भ्रम टूटेंगे और बच्चों को स्वस्थ जीवन देने वाले टीकाकरण जैसे अभियान सफल हो सकेंगे।यूनिसेफ इंडिया और थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के तत्वावधान में हरियाणा के सूरजकुंड में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञ प्रशिक्षकों ने हिंदी,अंग्रेजी, उर्दू और अन्य भाषाओं के वरिष्ठ पत्रकारों और शिक्षाविदों के साथ उन चेक प्वाइंट्स पर आमराय बनाई जो सेहत, इलाज और टीकाकरण से जुड़ी किसी भी खबर को प्रामाणिक बना देते हैं।
कार्यशाला में चार सुपर ट्रेनर्स ने प्रिंट, टीवी और रेडियो के वरिष्ठ पत्रकारों से क्रिटिकल अप्रैजल स्किल (कैस) पर चर्चा की गई। इसकी मदद से जिला ब्यूरो और रिपोर्टर्स को हेल्थ रिपोर्टिंग के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए भावी प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा भी तैयार की गई। इस कार्यशाला का उद्देश्य देश के सभी कस्बों-गांवों तक में टीकाकरण कर मानव जीवन को बेहतर बनाना था। अमर उजाला के डिजिटल संपादक संजय अभिज्ञान के नेतृत्व में चार अलग-अलग केंद्रों के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी ने इस कार्यशाला में हिस्सा लिया।
खुली बहस से निकलती रहीं राहें
बैक्टीरिया, वायरस या परजीवियों के कारण फैलने वाली बीमारियों के कारण हों या सुपरबग जैसे बड़े खतरे। परिचर्चा में इस बात पर खुलकर बहस हुई कि इनकी वजह से फैलने वाली बीमारियों और उनके सही इलाज के बारे में आमजन को किस तरह जानकारी दी जाए। पत्रकारों ने इनसे जुड़े तमाम सवाल उठाए। विशेषज्ञों ने क्रिटिकल अप्रैजल स्किल (सीएएस) के आलोक में रिपोर्टिंग में शामिल किए जाने वाले तथ्यों पर ध्यान केंद्रित करने की कला बताई।
लाइव उदाहरण, बेबाक टिप्पणी
इस कार्यशाला की खूबी रही बेबाकी। कार्यशाला के दौरान एक सुपर ट्रेनर ने हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों में एक ही दिन प्रकाशित हुई खबरें सबके सामने रख दीं और उन्हें क्रिटिकल अप्रैजल स्किल (सीएएस) के पैमाने पर परखने की चुनौती मिली। खबरों को परखने के बाद प्रतिभागियों ने खबरों पर बेबाक टिप्पणियां कीं। कुछ खबरों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया तो कुछ खबरों पर सबने संतुष्टि जताई। अंत में सुझाव आया कि अब वे खबरों का डिसेक्शन( चीर-फाड़) करेंगे लेकिन अखबार और रिपोर्टर का नाम नहीं देंगे। वर्तमान में पत्रिकारिता को इसी तरह के खुलेपन और बेबाकी की जरूरत है।
सतत विकास में मीडिया की भूमिका
युनिसेफ
टीकाकरण, जच्चा-बच्चा की सेहत या बीमारियां एवं इलाज से जुड़ी भ्रांतियां ये सभी यूनिसेफ के साल 2030 तक सबको बेहतर स्वास्थ्य देने के कार्यक्रम का हिस्सा हैं। साफ पानी, सेनिटेशन, अशिक्षा, गरीबी और असमानता जैसे तमाम विषय इस राह के रोड़े हैं। इन परेशानियों को दूर करने के लिए लोगों तक सही जानकारी पहुंचाना बेहद जरूरी है।
यूनिसेफ इंडिया की सोनिया सरकार का मानना है कि मीडिया सही और तथ्यपरक रिपोर्टिंग से ये लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। इसलिए मीडिया के वरिष्ठ संपादकों को सुपर ट्रेनर के रूप में रखा गया है। उन्होंने मिड 19 से 21 अप्रैल तक चली कार्यशाला में लेवल ट्रेनर तैयार किए हैं। ये ट्रेनर अपने लेखन और जिला स्तर पर रिपोर्टर्स को प्रशिक्षण देकर हेल्थ रिपोर्टिंग में तथ्यों और आंकड़ों के समायोजन में वृद्धि करने में मदद करेंगे। इससे यूनिसेफ को 2030 के लिए निर्धारित सतत विकास के लक्ष्य (एसडीजी) को हासिल करने में मदद मिलेगी।
कार्यशाला में थॉमसन रॉयटर फाउंडेशन के रॉयसन मार्टिन ने अपनी अनोखी संप्रेषण क्षमता से जहां गंभीर विषयों पर चुटीली बहस शुरू करवाई, वहीं हर सत्र का समापन खुशमिजाज माहौल में हो, इस बात का भी पूरा ख्याल रखा। यूनिसेफ की सोनिया सरकार और उनकी टीम ने किस तरह कार्यक्रम को लेकर उठे हर सवाल का समाधान मौके पर ही किया। मास्टर ट्रेनर संजय अभिज्ञान, प्रमोद जोशी, आरती धर और मुजफ्फर हुसैन गजाली प्रशिक्षक कम, सहयोगियों को ज्यादा प्रोत्साहित करते रहे। उन्होंने अपनी टीम के हर सदस्य को विषय पर प्रस्तुति का मौका दिया। आकाशवाणी के डिप्टी डायरेक्टर जनरल (प्रोग्राम) राजीव शुक्ल, आकाशवाणी बरेली की केंद्र निदेशक मीनू खरे, राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संजीव भानावत, वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल, अतुल चंद्रा, पुष्य मित्र, संजय श्रीवास्तव ने भी कार्यशाला की हर चर्चा में भाग लेकर इसे सफल बनाया।