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Hijab Row: इस्लामिक विशेषज्ञ बोले- तीन तलाक और गर्भपात कानून की तरह हिजाब में भी बड़ी लकीर खींचे सुप्रीम कोर्ट

अमित शर्मा
Updated Thu, 13 Oct 2022 11:17 PM IST

सार

Hijab Row: इस्लामिक मामलों के जानकार और महिला अधिकार कार्यकर्ता हिजाब को इस्लाम या कुरान का अनिवार्य हिस्सा नहीं मानते। ज्यादातर का मानना है कि यह एक पुरानी रिवायत हो सकती है, जिसकी आधुनिक समाज में कोई आवश्यकता नहीं है। इसके कारण महिलाओं की तरक्की में पड़ रही बाधा को ध्यान में रखते हुए इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए...
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Hijab Row - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)


लेकिन हिजाब मामले में सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान बेंच ने कोई सीधा स्टैंड न लेते हुए इसे बड़ी बेंच को रेफर करने के लिए कह दिया है। इस तरह इस मामले पर सर्वोच्च न्यायलय का अंतिम निर्णय जानने के लिए कुछ दिन और इंतजार करना पड़ेगा। लेकिन इस्लामिक मामलों के जानकार और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिस समय ईरान की महिलाएं हिजाब से आज़ादी के लिए जंग लड़ रही हैं और इसके लिए बलिदान दे रही हैं, सर्वोच्च न्यायालय को स्पष्ट आदेश देकर पूरी दुनिया को एक बड़ा संदेश देने की कोशिश करनी चाहिए।


इस्लामिक मामलों के जानकार और महिला अधिकार कार्यकर्ता हिजाब को इस्लाम या कुरान का अनिवार्य हिस्सा नहीं मानते। ज्यादातर का मानना है कि यह एक पुरानी रिवायत हो सकती है, जिसकी आधुनिक समाज में कोई आवश्यकता नहीं है। इसके कारण महिलाओं की तरक्की में पड़ रही बाधा को ध्यान में रखते हुए इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। इस विवाद के पीछे ज्यादातर विशेषज्ञ राजनीति को जिम्मेदार मानते हैं।     

महिलाओं को पीछे रखने की साजिश- शाजिया इल्मी

भाजपा की शीर्ष नेता शाजिया इल्मी ने अमर उजाला से कहा कि आज के आधुनिक समाज में पूरी दुनिया को यह समझने की आवश्यकता है कि हिजाब या बुरका महिलाओं के लिए ही क्यों लाया गया होगा? यह उनकी व्यक्तिगत राय है कि यह पुरुषों के द्वारा महिलाओं के ऊपर थोपा गया एक सामाजिक दबाव है, जो उन्हें हमेशा यह याद दिलाता है कि वे पुरुषों से कमतर हैं और उनसे पीछे हैं। उन्होंने कहा कि हिजाब के रूप में थोपे गए इस परिधान से महिलाओं को हमेशा यह याद कराया जाता था कि उन्हें पुरुषों के द्वारा बनाये गए नियमों-कानूनों के अनुसार ही चलना है और उसी के अनुसार व्यवहार करना है।



वे इससे आज़ादी की घोषणा नहीं कर सकतीं। ऐसा करने पर उन्हें अफगानिस्तान और ईरान जैसे देशों में आज भी सजा दी जाती है। ईरान में पैदा विवाद इसी कारण हुआ है। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक समाज में इस तरह की सोच को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता, और इसलिए हिजाब पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। हमारे देश की महिलाओं को अब और ज्यादा देर तक कैद में रखना किसी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।  

दूसरी महिलाएं भी होंगी प्रभावित

शाजिया इल्मी ने कहा कि जब तक एक भी महिला हिजाब पहनती रहेगी, यह हमारे समाज का हिस्सा रहेगा। इससे दूसरे परिवार भी (धार्मिक-सामाजिक आधारों पर) अपने परिवार की महिलाओं को भी जबरन इसे पहनने का आदेश देते रहेंगे, जो इसे नहीं पहनना चाहती होंगी। लिहाजा यह मामला किसी एक महिला की पसंद तक सीमित नहीं रह जाता है। इसके व्यापक असर को ध्यान में रखते हुए इस पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

सियासत बड़ा कारण

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों के साथ-साथ पूरे समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि यह धार्मिक मामला नहीं है, बल्कि इसके जरिये एक वर्ग अपनी सियासत को बनाये रखना चाहता है। धार्मिक आधार पर महिलाओं को हमेशा के लिए पीछे रखने की यह नापाक कोशिश है, जिसे अब बंद करने का समय आ गया है। किसी की सियासत के लिए करोड़ों महिलाओं की जिंदगी दांव पर नहीं लगाई जा सकती जो उन्हें सीखने, समझने और आगे बढ़ने में बाधा पैदा करता है।

कुरान का हिस्सा नहीं

महिला अधिकार कार्यकर्ता अंबर जैदी ने कहा कि अरब-ईरानी समाज में पहले महिलाएं ‘जिलबाब’ पहनती थीं, जिसमें उनका वक्षस्थल के पास का कुछ हिस्सा खुला रह जाता था, इसे ढकने के लिए ही हिजाब जैसी चीज लाई गई। लेकिन इसके बाद भी यह समझना होगा कि कुरान में कहीं भी महिलाओं को हिजाब पहनना अनिवार्य नहीं किया गया है। महिलाओं से केवल अपना सिर और वक्षस्थल ढक कर रखने की अपेक्षा की गई है जो सभी महिलाएं स्वयं करती हैं, लिहाजा इस पर तुरंत प्रतिबंध लगाने में देरी नहीं की जानी चाहिए।

विरोध आसान नहीं

अंबर जैदी का मानना है कि जिस समय ईरानी महिलाएं हिजाब से आज़ादी की जंग में अपने प्राण न्योछावर कर रही हैं, उस समय हमारे ही देश में कुछ लोग महिलाओं को बुर्के और हिजाब की आड़ से बाहर नहीं निकलने देना चाहते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि न्यायालयों को यह समझना चाहिए कि धार्मिक और सामजिक जकड़न इतनी सशक्त होती है कि मजबूत से मजबूत व्यक्ति भी इससे विरोध का साहस नहीं कर पाता।



ऐसे में महिलाओं से इससे आज़ादी के खिलाफ बड़े स्तर पर आवाज उठाये जाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। पति और पिता पर आर्थिक मामलों में निर्भरता और अन्य पारिवारिक कारणों से ज्यादातर महिलाएं इसके खिलाफ बोलने में समर्थ नहीं होतीं। इसलिए भारत में भी इसके विरोध में किसी बड़े आन्दोलन का इंतज़ार किये बिना उन्हें इससे आज़ाद करने की पहल की जानी चाहिए।   

सत्ता पर पकड़ का रास्ता बना हिजाब

इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने कहा कि सौ साल पहले लगभग सभी धर्मों में पर्दा प्रथा, बाल विवाह या इसी के जैसी कई अन्य सामाजिक कुरीतियां विद्यमान थीं। शिक्षा के प्रसार के साथ लोगों ने इन कमियों को समझा और उन्हें दूर किया। लेकिन इस्लामिक जगत में एक अभिजात्य वर्ग ऐसा है, जो आज भी सत्ता पर अपनी पकड बनाये रखने के लिए मुसलमानों को धर्म के नाम पर मध्ययुगीन सोच से बाहर नहीं निकलने देना चाहता है। यही वर्ग है जो कुरान का हिस्सा न होने के बाद भी कभी तीन तलाक का विरोध करता है तो कभी मदरसा और हिजाब को धर्म के नाम पर बनाए रखना चाहता है। कुरान में कहीं भी चेहरे को ढकने को अनिवार्य बनाने जैसी बात नहीं कही गई है। बल्कि महिलाओं को अपना सर और वक्षस्थल ढके रखने की हिदायत दी गई है, जो बिना किसी परेशानी के हर महिला स्वयं करती है। उन्होंने कहा कि जिस समय ईरान में महिलाएं हिजाब से आज़ादी के लिए जंग लड़ रही हैं, पुरुष भी उनके साथ खड़े होकर उनका हौंसला बुलंद कर रहे हैं, सर्वोच्च न्यायालय को भी इस मामले में निर्भीकता से निर्णय देकर पूरी दुनिया के सामने बड़ा उदाहरण पेश करना चाहिए।

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