उच्च न्यायालय ने 8 जनवरी से शुरू होने वाली अखिल भारतीय सिविल सेवा की मेन परीक्षा पर एक बार फिर रोक लगाने से इंकार कर दिया। अदालत ने विकलांगों के लिए कम सीटें आरक्षित करने के मुद्दे पर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि याचिका स्वीकार कर ली जाती है तो विकलांगों को उसी के अनुसार राहत प्रदान की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान हालांकि कहा कि भारतीय सिविल सेवा मुख्य परीक्षा और बाद में साक्षात्कार के लिए उम्मीदवारों का चयन में विकलांग श्रेणी के पदों की वास्तविक संख्या घोषित किए बिना निर्णय लेना एक तरह से निरंकुशता है।
अदालत ने केंद्र व संघ लोक सेवा आयोग को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि उसने किस आधार पर तय किया कि विकलांग श्रेणी के कितने पद हैं।
खंडपीठ ने कहा कि जब आपकी रिक्तियों में उतार-चढ़ाव हो रहा है तो आप कितने लोगों को मेन और साक्षात्कार के लिए बुलाएंगे। अदालत ने कहा कि कुल वास्तविक संख्या तय किए बिना मेन और साक्षात्कार के लिए उम्मीदवारों को बुलाना मनमाना निर्णय माना जाएगा।
याचिकाकर्ता के अनुसार कानूनन विकलांगों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण तय है। कुल पदों 796 में चार प्रतिशत के तहत कुल 31.8 पद आरक्षित होने चाहिए जबकि संस्थान ने 24 पदों को आरक्षित बताया है। यह सरासर गणनना में गलती है।
अदालत ने मामले की सुनवाई 29 जनवरी तय करते हुए केंद्र सरकार व यूपीएससी को इसस मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। अदालत ने फिलहाल मामले में अंतरिम आदेश देने से इंकार कर दिया।
याची ने खंडपीठ से आग्रह किया कि 8 जनवरी से 17 जनवरी के बीच होने वाली मेन परीक्षा पर रोक लगाई जाए या फिर केंद्र को निर्देश दिया जाए कि यदि याचिकाएं स्वीकार की जाती है तो बाद में विकलांग व्यक्तियों के लिए परीक्षा आयोजित की जाए ।
अदालत ने इस मुद्दे पर कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने से इंकार करते हुए कहा कि यदि याचिका स्वीकार कर ली गई तो उसी हिसाब से राहत प्रदान की जाएगी।
याची ने कहा कि कानून में तय आरक्षण से कम सीटें एक अनुमान के आधार पर तय की गई है ऐसे में केंद्र व यूपीएससी को विकलांग श्रेणी में उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने का आदेश जारी किया जाए।