उच्च न्यायालय ने हत्या व लूटपाट के दो दोषियों को राहत प्रदान करने से इंकार कर दिया। अदालत ने उनके उस तर्क को खारिज कर दिया कि पुलिस ने फर्जी गवाहों के बयानों के आधार पर उनको इस मामले में फंसाया है। अदालत ने कहा कि पेश गवाहों व साक्ष्यों से स्पष्ट है कि दोषी हत्या व लूटपाट के मामले में लिप्त रहे है।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की खंडपीठ ने अपने फैसले में दोषियों की अपील खारिज करते हुए कहा कि वे ऐसा कोई भी साक्ष्य पेश नहीं कर पाए कि जांच अधिकारी ने उन्हें फर्जी मामले में फंसाया है। इसके अलावा ऐसा भी कोई साक्ष्य नहीं है कि उनके खिलाफ फर्जी चश्मदीद गवाह बनाए गए है।
खंडपीठ ने उनके इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि मृतक के पास से मुनीर आलम नामक व्यक्ति के नाम का फोन मिला था और पुलिस ने उसे ने उसे गवाह तक नहीं बनाया संभवत: हत्या उसी ने की हो।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को मान लिया कि 10 वर्ष पहले सिम प्रदान करने के दौरान वर्तमान समय की तरह सिम खरीदने वाले की आईडी नहीं ली जाती थी। अदालत ने कहा दोषी इस तर्क देकर राहत नहीं पा सकते।
खंडपीठ ने कहा दोषियों ने इस हत्या की रात ही उसी स्थल पर गौरव कथूरियां से भी चाकू की नोक पर लूटपाट की थी। गौरव ने भी दोषियों की पहचान की है। इसके अलावा अदलत ने उनके इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि गवाहों के बयानों में विरोधाभास है।
अदालत ने कहा कि उनके वकीलों ने घटना से चार वर्ष बाद उनसे जिरह की थी और इस अंतराल में घटना का समय व कुछ बाते याद नहीं रहती। पेश साक्ष्यों व गवाहों के बयानों से स्पष्ट है कि दोनों दोषियों ने ही अपने तीसरे नाबालिग साथी के साथ घटना को अंजाम था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार संगम विहार इलाके में 28 नवंबर 2010 की रात करीब एक बजे रोशन नामक युवकी की चाकू मार कर हत्या कर उससे लूटपाट की गई थी। इस मामले में पुलिस ने सोनू उर्फ हेमराज व मुकेश को गिरफ्तार किया था। उनके तीसरे साथी को अदालत ने नाबालिग मान लिया था।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 23 फरवरी 2019 को दिए फैसले में आजीवन कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई थी।