हाईकोर्ट ने पर्यवेक्षण में पाया कि आयोग मानसिक स्वास्थ्य एक्ट-2017 से पूरी तरह अनजान है। उसे महिला की मनोचिकित्सा का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं था।
केरल उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा है कि बाल अधिकार आयोग में नियुक्तियां किस तरह की जाती हैं और इसके लिए पात्रता क्या है? वैवाहिक विवाद में पति की शिकायत पर एक महिला की मनोचिकित्सा का निर्देश देने के मामले में हाईकोर्ट ने यह सवाल किया।
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हाईकोर्ट ने पर्यवेक्षण में पाया कि आयोग मानसिक स्वास्थ्य एक्ट-2017 से पूरी तरह अनजान है। उसे महिला की मनोचिकित्सा का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं था। यह भी जिला बाल संरक्षण अधिकारी (डीसीपीओ) की राय पर दिया गया। इससे सवाल उठाता है कि डीसीपीओ यह तय करने में कैसे सक्षम है कि महिला को मनोचिकित्सा परीक्षण और इलाज की जरूरत है।
यह बात भी भय पैदा करती है कि आयोग ने सोचा कि डीसीपीओ से मानसिक हालत पर रिपोर्ट मांगी जा सकती है। जिस न्यायिक अधिकारी को मानसिक स्वास्थ्य एक्ट के तहत निर्णय लेने का अधिकार था, उसने महिला को मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराने की पति की याचिका को खारिज कर दिया। एजेंसी