सेना में महिला अफसरों के स्थायी कमीशन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान केंद्र ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की अपनी नीति का बचाव किया। केंद्र ने कहा कि इस पहलू पर शीर्ष अदालत के फैसलों का बिना किसी भेदभाव के पालन किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुयां और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सेना के 84 अधिकारियों से जुड़ी याचिका अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) का मामला 13 महिला अफसरों से जुड़ा है। उन्होंने स्थायी कमीशन से वंचित किए जाने को चुनौती दी है। इनमें लेफ्टिनेंट कर्नल वनीता पाधी, लेफ्टिनेंट कर्नल चंदनी मिश्रा, लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा और अन्य अफसर शामिल हैं, जिन्होंने कठिन और संवेदनशील इलाकों में तैनाती के बावजूद स्थायी कमीशन नहीं पाया।
गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र और सेना की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि बबीता पुनिया मामले में 2020 के फैसले और नितिशा मामले में 2021 के फैसले ने वास्तव में नीति को बरकरार रखा है। जो भी दोष अभी भी थे और अदालत द्वारा बताए गए थे, उन्हें ठीक कर दिया गया था। कोई भी प्रक्रिया सभी को संतुष्ट नहीं कर सकती और हमेशा असंतोष बना रहेगा। उन्मूलन भी सेना को युवा बनाए रखने की नीति का हिस्सा है और इसे बिना किसी भेदभाव के सभी पर समान रूप से लागू किया जाता है।
इस पर न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि सेना ने स्थायी कमीशन पर अपनी नीति में सुधार कर लिया है और जो भी खामियां थीं, उन्हें नितीशा फैसले के बाद दूर कर दिया गया है। पीठ ने कहा कि वह नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल से स्थायी कमीशन से संबंधित इसी प्रकार की याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगी।
केंद्र ने किया था भेदभाव से इनकार
इससे पहले बुधवार को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि सेना में महिला अफसरों को शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) देने में कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है। सभी नियमों का पालन किया जा रहा है। भाटी ने बताया कि स्थायी कमीशन प्रदान करने में नीतिगत निर्णय का पालन किया जा रहा है। अदालत में याचिका दायर करने वाली महिला अधिकारियों की दलीलों का विरोध करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उन अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट वास्तव में लैंगिक रूप से तटस्थ थी, जिसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं था।
उन्होंने कहा कि सेना में हम बहुत सख्त व्यवस्था का पालन करते रहे हैं और भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि चयन बोर्ड के आगे अधिकारी का नाम नहीं लिखा होता। एसीआर में मानदंड नियुक्ति या कठिन क्षेत्र में पोस्टिंग पर विचार न करने के तर्कों पर विचार करते हुए भाटी ने कहा कि ऐसी नियुक्तियां महत्वहीन हैं और अधिकारियों को वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में औसत अंक दिए गए हैं।
भाटी ने कहा कि स्थायी कमीशन प्रदान करते समय एसीआर में कई पहलुओं पर विचार किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल नियुक्ति के मानदंड पर ही स्थायी कमीशन दे दिया जाए। भाटी ने कहा कि एसएससी के माध्यम से नियमित अधिकारियों और संबंधित सहायक कर्मचारियों का अनुपात, वांछित 1:1 के अनुपात के विपरीत बहुत विषम है। अच्छे अधिकारियों की कमी है। 250 अधिकारियों की सीमा है। जिन्हें एसएससी बैच के अधिकारी की योग्यता के आधार पर स्थायी कमीशन देने पर विचार किया जा रहा है।
महिला अफसरों की दलील
13 महिला अफसरों ने कहा कि महिला अफसरों को पुरुषों की तरह लगातार स्थायी कमीशन को ध्यान में रखकर आंका ही नहीं गया। 2020 से पहले महिलाएं स्थायी कमीशन के लिए पात्र नहीं थीं, इसलिए उनकी एसीआर 2019 में फ्रीज कर दी गई। इससे उनका ग्रेडिंग और रिकॉर्ड कमजोर हो गया, जबकि उन्होंने भी कठिन क्षेत्रों में वही जिम्मेदारियां निभाईं जो पुरुष अफसर निभाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा 'ऑपरेशन गलवां' में लद्दाख में कम्युनिकेशन की कमान संभाल चुकी हैं और लेफ्टिनेंट कर्नल स्वाति रावत 'ऑपरेशन सिंदूर' और जम्मू-कश्मीर के आतंक प्रभावित इलाकों में तैनात रहीं। गुरुस्वामी ने यह भी बताया कि एक महिला अफसर जिन्होंने बालाकोट एयर स्ट्राइक से विमान वापस लाए थे, उन्हें सिर्फ एक हफ्ते बाद ही सेवा छोड़ने के लिए कहा गया।