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स्वास्थ्य: सुस्त जीवनशैली लिवर के लिए खतरनाक, 33 साल में 143% बढ़े रोगी; जानें 2050 तक कितने लोग होंगे बीमार

Wed, 15 Apr 2026 04:00 AM IST
Pavan अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

यह ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है, लेकिन इसका कारण शराब नहीं बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय की गड़बड़ी होती है। यह बीमारी खासतौर पर मोटापा, डायबिटीज और असंतुलित जीवनशैली से जुड़ी होती है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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शराब या धूम्रपान ही नहीं सुस्त जीवनशैली और खान-पान की बदलती आदतों से बढ़ते मोटापे के कारण दुनियाभर में लिवर की बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। अगर स्थिति ऐसी ही रही, तो साल 2050 तक प्रभावित लोगों की संख्या 180 करोड़ हो सकती है। द लैंसेट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपेटोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।
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यह भी पढ़ें - चिंताजनक: हर चार में एक डायबिटिज रोगी को लिवर की बीमारी का भी खतरा; लगभग 70% मरीजों में मिले फैटी लिवर

अध्ययन के अनुसार, साल 2023 में दुनियाभर में लगभग 130 करोड़ लोग मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीयोटिक लिवर डिजीज (एमएएसएलडी) से पीड़ित थे। शोधकर्ताओं ने कहा कि ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) 2023 के आंकड़ों पर आधारित इस विश्लेषण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के मुताबिक, 1990 में 50 करोड़ लोग एमएएसएलडी से पीड़ित थे। 2023 तक 143 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। एमएएसएलडी को पहले नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) के नाम से जाना जाता था।
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यह ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है, लेकिन इसका कारण शराब नहीं बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय की गड़बड़ी होती है। यह बीमारी खासतौर पर मोटापा, डायबिटीज और असंतुलित जीवनशैली से जुड़ी होती है। समस्या यह है कि यह लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में विकसित होती रहती है, जिससे समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है।

उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व सबसे अधिक प्रभावित
अध्ययन में पाया गया कि उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों में एमएसएलडी की दर अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक है। प्रभावित आबादी का बड़ा हिस्सा होने के कारण इन देशों की स्वास्थ्य सेवाओं पर भविष्य में लिवर सिरोसिस और कैंसर जैसी बीमारियों के तेजी से बढ़ने की आशंका है।

महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा हो रहे बीमार
रिपोर्ट के अनुसार, यह बीमारी पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अधिक पाई जाती है। उम्र के लिहाज से बुजुर्गों, खासकर 80 से 84 वर्ष के लोगों में इसका जोखिम सबसे ज्यादा है। हालांकि, कुल मामलों की संख्या पर नजर डालें तो यह बीमारी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। पुरुषों में 35 से 39 वर्ष और महिलाओं में 55 से 59 वर्ष की उम्र के बीच इसके सबसे अधिक मामले सामने आ रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह बीमारी अब कामकाजी उम्र के लोगों को भी तेजी से प्रभावित कर रही है।
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बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय: विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका स्वस्थ जीवनशैली अपनाना है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और वजन को नियंत्रित रखना इसके जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है।
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