शर्मीला के वकील अंकुर छिब्बर ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "उन्होंने तीन बार अलग-अलग तरीके से अपना मामला अधिकारियों के सामने रखा लेकिन हर बार उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। " आखिरकार मामला दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचा जहां शर्मीला के पक्ष में फैसला आया।
अंकुर छिब्बर के मुताबिक, "कोई व्यक्ति मेडिकली अनफिट तभी कहा जा सकता है जब वो किसी तरह की शारीरिक अक्षमता का शिकार हो या गंभीर रूप से घायल हो। गर्भवती होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, प्रेग्नेंट होने से कोई औरत अनफिट नहीं हो जाती।" उन्होंने कहा कि जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस नवीन चावला ने अपने फैसले में कुछ बेहद अहम बातों की ओर ध्यान दिलाया जो भविष्य में ऐसे मामलों में पत्थर की लकीर बनेंगी।"
'गर्भवती महिला अनफिट नहीं'
बीबीसी के पास अदालत के इस फैसले की प्रति है। फैसले में जजों की कही कुछ अहम बातें इस तरह हैं-
• प्रेग्नेंसी की वजह से होने वाला भेदभाव निंदनीय है। ये बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। इससे समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन होता है।
• अगर किसी औरत के गर्भवती होने की वजह से उसके साथ किसी भी तरह का भेदभाव होता है तो यह लिंग आधारित भेदभाव है जो पूरी तरह गैरकानूनी है। किसी भी महिला के साथ ऐसा करना नाइंसाफी होगी क्योंकि मां बनना उसका प्राकृतिक अधिकार है।"
• अगर प्रेग्नेंसी के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव होता है तो इसका मतलब ये होगा कि हम प्रेग्नेंसी को 'विकलांगता' मान रहे हैं और गर्भवती महिला को विकलांग जो बिल्कुल गलत होगा।
फैसले में ये भी कहा गया कि शर्मीला यादव मामले में सीआरपीएफ का रवैया गलत धारणाओं पर आधारित, अन्यायपूर्ण और अस्वीकर्य है। जजों ने कहा कि इस तरह की घटनाओं में भेदभाव छिपा होता है और ये संविधान के नियमों का उल्लंघन है।