72 साल पहले संविधान ने हमें लोकतांत्रिक गणराज्य दिया। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन सुनिश्चित करने के लिए संविधान निर्माताओं ने कानून बनाने और शासन चलाने का जिम्मा चुने हुए प्रतिनिधियों को दिया।
सांविधानिक तरीकों के बजाय लोगों ने पकड़ा हठ का रास्ता
लेकिन कुछ वर्षों में एक चलन शुरू हुआ है, जिसमें संसद में बनने वाले कानूनों को खारिज किया जाने लगा है। इस कड़ी में पहले सीएए, अनुच्छेद-370 और अब कृषि कानूनों पर गण और तंत्र आमने-सामने हैं। असहमति के नाम पर शुरू प्रदर्शन हठधर्मिता का आंदोलन बन जाता है।
इसमें अड़ियल रवैये से कोई हल नहीं निकलता। इससे पैदा गतिरोध न सिर्फ आमजन के जीने के अधिकार का हनन करता है बल्कि देश की छवि भी खराब करने का काम करता है। जानकारों के मुताबिक, अपने मनमाफिक कानून चाहने वाली स्थिति कतई संविधान सम्मत नहीं है।
फिर संस्थानों की मान्यता ही क्या रहेगी
जाने-माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि आंदोलनों पर सरकार झुक जाए, तो हमें आए दिन यही तरीका देखने को मिलेगा। किसानों के बाद खेतिहर, मजदूर, शिक्षक, फैक्ट्री कर्मचारी और ट्रेड यूनियनें अड़ जाएंगी। अगर हर मौके पर संस्थानों का घेराव करने लगेंगे तो फिर उनकी क्या मान्यता रह जाएगी।
दूसरों के लिए अपमानजनक नारे, ये कैसी अभिव्यक्ति
किसान आंदोलन में कई आपत्तिजनक और अपमान भरे नारे भी गूंज उठे। इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार कैसे करार दिया जा सकता है। यह अभिव्यक्ति के अधिकार का सरासर दुरुपयोग है। राजनेताओं को पता है कि कोई भी मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है। पर वह फायदे के लिए इनका जानबूझकर बेजा इस्तेमाल होने देते हैं।