ताऊ देवीलाल का कुनबा आज दो दलों में बंटा है। चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के बेटे और स्वर्गीय ताऊ देवी लाल के पोते अजय चौटाला और उनके बेटे दुष्यंत चौटाला दोनों जननायक जनता पार्टी (जजपा) को देवीलाल की असली विरासत बता रहे हैं, तो दूसरे पौत्र अभय चौटाला इनेलो को ही देवीलाल की पार्टी कहते हैं। बराला के मुताबिक, हरियाणा बनने के बाद संभवतय: यह पहला विधानसभा चुनाव होगा, जिसमें देवीलाल परिवार या उनकी पार्टी खुद को चुनावी मुकाबले में शामिल नहीं कर पा रही है।
चौ. देवीलाल 1971 तक कांग्रेस पार्टी में रहे। इसके बाद 1977 में उन्होंने जनता पार्टी का दामन थाम लिया। यहां भी जब कुछ ठीक नहीं लगा, तो वे जनता दल में चले गए। 1988 से लेकर 1990 तक वे जनता दल के साथ रहे, लेकिन यहां भी वे ज्यादा दिन नहीं टिके। अगले छह साल तक देवीलाल ने समाजवादी जनता पार्टी को संभाला। 1996 में उन्होंने इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) की स्थापना कर दी।
लेकिन 2004 में कांग्रेस पार्टी ने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका और उसके बाद से लेकर अभी तक इनेलो सत्ता में आने के लिए हाथ पैर मार रही है। लेकिन प्रदेश की जनता इस ओर नहीं देख रही। चंद्रप्रकाश के मुताबिक चौ. देवीलाल ने जिस तरह से सभी जातियों को साथ लेकर राज किया था, बाद में उनका कुनबा उनकी विरासत को बरकरार नहीं रख पाया। धीरे-धीरे इस पार्टी पर जाट समुदाय की पार्टी होने का ठप्पा लग गया। अगर आज हरियाणा में भाजपा को मजबूती से पांव जमाने का मौका मिला है, तो उसके पीछे एक बड़ी वजह इनेलो और उसकी जनविरोधी नीतियां रही हैं।
जब तक देवीलाल के हाथ में पार्टी की कमान रही तो प्रदेश के नेताओं में इनेलो ज्वाइन करने की होड़ लगती थी। देवीलाल दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री, देश के उपप्रधानमंत्री भी रहे। चाहे भजनलाल हों या बंसीलाल, देवीलाल के रहते उनके लिए विधानसभा चुनाव जीतना कभी आसान नहीं रहा। हार जीत भले ही किसी की हुई हो, लेकिन ताऊ देवीलाल को चुनावी मैदान में एक मजबूत राजनेता माना जाता था। लेकिन जब उनका कुनबा बिखरा, तो पार्टी भी तिनके की तरह हो गई। नतीजा, लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली।
हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इनेलो के लंबे समय तक प्रदेशाध्यक्ष रहे अशोक अरोड़ा भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला के अत्यंत करीबी रहे कालका के पूर्व विधायक प्रदीप चौधरी भी कांग्रेस में आ गए। इनके अलावा नसीम अहमद, केहर सिंह, नगेंद्र भड़ाना, बलवान सिंह, परमिंद्र ढुल, रविंद्र, रामचंद्र कंबोज, मक्खन लाल सिंगला, रणबीर गंगवा और जाकिर हुसैन समेत कई दूसरे नेताओं ने भाजपा का दाम थाम लिया है।
जींद से उपचुनाव जीते डॉ. कृष्ण मिड्ढा भी पहले इनेलो में ही रहे हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीतने वाली इनेलो के पास अब चुनाव आते-आते मात्र तीन विधायक बचे हैं। बाकी सभी दूसरी पार्टियों में चले गए।
हरियाणा में शनिवार को विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। भाजपा नेता जहां 75 सीटें जीतने का दावा ठोक रहे हैं, तो कांग्रेस भी खुद को चुनावी मुकाबले में खड़ा करने की जद्दोजहद कर रही है। ताऊ देवीलाल के कुनबे वाली इनेलो और जजपा अभी चुनाव से परे हटकर खुद को देवीलाल की विरासत का असली हकदार साबित करने में लगी हैं। दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते इतने खराब हो चुके हैं कि अब ताऊ देवीलाल की जयंती भी अलग-अलग दिन मनाई जा रही है।
प्रदेश की राजनीति की नब्ज पहचाने वाले रविंद्र कुमार कहते हैं, अब ताऊ देवीलाल का जमाना चला गया है। उनके कुनबे ने वह सब खो दिया है, जो ताऊ ने तिनका-तिनका कर जोड़ा था। लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने हैं, अब अगले माह विधानसभा चुनाव का परिणाम भी आ जाएगा। मौजूदा राजनीतिक हालात में इनेलो या जजपा पूरी तरह चुनावी दौड़ से बाहर हैं।
हालांकि अभय चौटाला का दावा है कि पिछले कुछ दिनों में भाजपा का ग्राफ गिरा है और इनेलो की ताकत बढ़ी है। भाजपा से लोग किनारा करने लगे हैं। वहीं कांग्रेस के बारे में उनका कहना है कि इसके नेता आज भी एकजुट नहीं हैं, शैलजा और हुड्डा के अलग अलग नारे लग रहे हैं।