इसमें सभी खेमों को कोई न कोई जिम्मेदारी दे दी गई। सोनिया गांधी को उम्मीद थी कि उनके इस कदम से प्रदेश कांग्रेस के नेता एकजुट होकर चुनाव लड़ेंगे। अब हालत यह हो गई है कि कुमारी शैलजा और भूपेंद्र सिंह हुड्डा जहां पर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, वहां दूसरे खेमें के नेता नहीं पहुंच रहे। सभी खेमें एक बार फिर एकला चलों की नीति पर हैं। हुड्डा और शैलजा ने रोहतक में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक ली तो वहां किरण चौधरी, अशोक तंवर और कैप्टन अजय यादव नहीं पहुंचे।
इसके बाद गुरुग्राम में हुई बैठक के दौरान भी ये तीनों नेता नदारद रहे। रेवाड़ी महेंद्रगढ़ के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हुआ तो वहां भी वही स्थितिदेखने को मिली। खास बात है कि हुड्डा शैलजा की इन बैठकों में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्त रणदीप सुरजेवाला भी नहीं दिखे।
कांग्रेस के लिए आत्मघाती तो भाजपा का फायदा ही फायदा
प्रदेश की राजनीति के जानकार चंद्रप्रकाश का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। जहां एक ओर चुनाव में अब महज बीस दिन शेष बचे हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस की खेमेबाजी जोरों पर है। न ही प्रदेशों के नेताओं के बयानों में ही कोई एकता दिख रही है और न ही कार्यकर्ता सम्मेलनों में उनकी एकजुटता नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस में भारी गुटबाजी है। पूर्व सीएम स्व. भजनलाल का कुनबा भी अलग ही राह पर है।
सभी अपने परिजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं, लेकिन पार्टी की एकजुटता की राह पर कोई भी नेता चलने को तैयार नहीं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा ने जिस तरह से 78 मजबूत उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है, वह कांग्रेस के लिए सबक का काम कर सकती है। वजह, इस सूची में भाजपा ने जिन चेहरों को शामिल किया है, वहां पार्टी में अंदरुनी स्तर पर कोई विरोध नहीं है। यह तय है कि कांग्रेस की खेमेबाजी खुद के लिए आत्मघाती तो भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगी।