सीट का समीकरण: पहले चुनाव में अपनों ने हराया, आठ साल बाद मिली पहली जीत; हरनौत में ऐसे बढ़ा नीतीश की वर्चस्व
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: संध्या कुमारी
Updated Fri, 28 Mar 2025 07:35 AM IST
सार
हरनौत सीट का चुनावी इतिहास कैसा रहा है? यहां जीतकर कौन-कौन से चेहरे विधानसभा पहुंचे? कैसे यह सीट जनता लहर के बीच भी जनता पार्टी के टिकट पर उतरे नीतीश कुमार यहां से अपना पहला ही चुनाव हार गए? नीतीश ने हरनौत को कैसे जदयू के किले में तब्दील किया? आइये जानते हैं…
नीतीश कुमार, बिहार में बीते 20 साल से सत्ता का पर्याय बने हुए हैं। साल 2000 में भी नीतीश महज सात दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। वो वक्त हो या आज का वक्त नीतीश इन 25 वर्षों में कभी भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़े। हर बार विधान परिषद सदस्य के रूप में ही उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। हालांकि, सत्ता की चाभी तो विधायकों से मिलती है। नीतीश के विधानसभा चुनाव लड़ने की बात करें तो वो साल 1977 था, जब नीतीश हरनौत विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे। पहले ही चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
बिहार चुनाव से जुड़ी हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ की दूसरी कड़ी में आज हम हरनौत विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। हरनौत सीट का चुनावी इतिहास कैसा रहा है? यहां जीतकर कौन-कौन से चेहरे विधानसभा पहुंचे? कैसे यह सीट जनता लहर के बीच भी जनता पार्टी के टिकट पर उतरे नीतीश कुमार यहां से अपना पहला ही चुनाव हार गए? नीतीश ने हरनौत को कैसे जदयू के किले में तब्दील किया? आइये जानते हैं…
हरनौत सीट पर लगातार दो बार जीतने में असफल रहे थे नीतीश कुमार।
- फोटो : PTI
नीतीश कुमार, बिहार में बीते 20 साल से सत्ता का पर्याय बने हुए हैं। साल 2000 में भी नीतीश महज सात दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। वो वक्त हो या आज का वक्त नीतीश इन 25 वर्षों में कभी भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़े। हर बार विधान परिषद सदस्य के रूप में ही उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। हालांकि, सत्ता की चाभी तो विधायकों से मिलती है। नीतीश के विधानसभा चुनाव लड़ने की बात करें तो वो साल 1977 था, जब नीतीश हरनौत विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे। पहले ही चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
बिहार चुनाव से जुड़ी हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ की दूसरी कड़ी में आज हम हरनौत विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। हरनौत सीट का चुनावी इतिहास कैसा रहा है? यहां जीतकर कौन-कौन से चेहरे विधानसभा पहुंचे? कैसे यह सीट जनता लहर के बीच भी जनता पार्टी के टिकट पर उतरे नीतीश कुमार यहां से अपना पहला ही चुनाव हार गए? नीतीश ने हरनौत को कैसे जदयू के किले में तब्दील किया? आइये जानते हैं…
10 जून 1977 को हरनौत विधानसभा सीट पर मतदान होना था। इससे चंद रोज पहले बिहार एक ऐसा हत्याकांड हुआ जिसने दो जातियों के बीच दुश्मनी की खाई पैदा कर दी। कहा जाता है कि इस हत्याकांड का असर हरनौत के विधानसभा चुनाव नतीजों पर भी पड़ा। क्योंकि ये घटना हरनौत से चंद किलोमीटर दूर बेलछी गांव में हुई थी।
2011 में आई किताब 'नीतीश कुमार एंड द राइज ऑफ बिहार' में अरुण सिन्हा लिखते हैं कि 1977 के चुनाव में हरनौत के कुर्मी वोटरों ने निर्दलीय उम्मीदवार भोला प्रसाद सिंह के समर्थन करने का एलान कर दिया था। दरअसल, भोला प्रसाद ने क्षेत्र के कई कुर्मियों को बंदूकों के लाइसेंस दिलाने में मदद की थी। इसके अलावा भोला ने इनमें से कई को बिजली दिलाने में भी मदद की। उन्हें कुर्मी संगठनों का नेता भी बनाया गया। 1976 में जब मोहाने नदी में जब बाढ़ आई थी, तब आसपास के गांवों में उन्होंने निजी तौर पर राहत-बचाव कार्य चलवाए थे।
अरुण सिन्हा लिखते हैं, ''कुर्मी समाज नीतीश के इंजीनियर होने की वजह से उन्हें एक बुद्धिमान नेता के तौर पर देखता था और जेपी के आंदोलन से जुड़े होने की वजह से उनका सम्मान भी करता था। लेकिन बेलछी कांड के बाद नीतीश कुमार कभी भी कुर्मी गौरव को लेकर खुले तौर पर कुछ नहीं बोले। वहीं, भोला प्रसाद सिंह लगातार मंचों से महावीर महतो से लेकर बेलछी कांड में शामिल अन्य कुर्मियों के समर्थन में बोलने लगे। इसके बाद कुर्मी समाज भोला प्रसाद के पीछे लामबंद हो गया। कुर्मी समाज के इस समर्थन की बदौलत निर्दलीय खड़े हुए भोला प्रसाद ने कर्पूरी ठाकुर के करीबी माने जाने वाले नीतीश को हरा दिया।'' इस तरह बेलछी कांड की वजह से नीतीश कुमार को अपने पहले ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। तब उनकी उम्र महज 26 साल ही थी।
लगातार दूसरी बार हरनौत में हारे नीतीश कुमार
देश में चल रही सियासी उथलपुथल का असर बिहार पर भी पड़ता रहा है। 1977 में जब जनता सरकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई तो उसके बाद बिहार समेत कई राज्यों में नए सिरे से चुनाव हुए थे। इसी तरह 1980 में जब इंदिरा गांधी फिर से केंद्र की सत्ता में आईं तो फिर से बिहार में नए सिरे से चुनाव हुए।
1985: तीसरी कोशिश में नीतीश ने फतह किया हरनौत का किला
1980 के चुनाव के बाद पांच साल में बिहार ने दो मुख्यमंत्री देखे। 1985 में राज्य में फिर से विधानसभा चुनाव कराए गए। हरनौत सीट पर एक बार फिर नीतीश कुमार उतरे। इस बार नीतीश लोकदल के टिकट पर मैदान में थे। लगातार दो असफलता के बाद नीतीश को हरनौत में सफलता मिली। इस जीत के साथ नीतीश पहली बार विधायक बने। 1985 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने कांग्रेस के बृजनंदन प्रसाद सिंह को 21,412 वोट से हराया। नीतीश जरूर जीत गए पर राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस ने एक बार फिर वापसी की।
1990: फिर से निर्दलीय उम्मीदवार ने मारी बाजी
वापस हरनौत सीट पर लौटते हैं। 1989 में लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नीतीश ने हरनौत विधानसभा सीट छोड़ दी। 1990 के विधानसभा चुनाव में हरनौत से एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली। इस बार यहां से बृजनंदन यादव 5,279 वोट से जीते। उन्होंने नीतीश की पार्टी जनता दल के टिकट पर उतरे भोला प्रसाद सिंह को हराया।
1995: नीतीश जीते पर सीट छोड़ी
1995 में एक बार फिर से नीतीश कुमार ने इस सीट से चुनाव लड़ा और जीत गए। इस चुनाव से पहले नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन कर चुके थे। नीतीश और लालू यादव की राहें जुदा हो चुकी थीं। एक बार फिर नई पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे नीतीश ने हरनौत सीट पर दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने जनता दल के टिकट पर उतरे विश्व मोहन चौधरी को 12242 वोट से हराया।
हालांकि, उन्होंने लोकसभा सदस्यता को बरकरार रखने के लिए यह सीट छोड़ दी, लेकिन अब तक नीतीश हरनौत के अपनी पार्टी के लिए किले में तब्दील कर चुके थे। इस चुनाव के बाद हरनौत सीट पर जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उसमें नीतीश की ही पार्टी को जीत मिली है। 1996 में हुए उपचुनाव में समता पार्टी के अरुण कुमार सिंह ने जनता दल के शिशु रंजन को 31,214 वोट से हराया। 2000 के विधानसभा चुनाव में भी समता पार्टी के विश्वमोहन चौधरी ने राजद के सुनील कुमार को 7,757 वोट से हराया।
लगातार पांच बार यहां से जीत चुका है जदयू
2003 में समता पार्टी जनता दल यूनाइटेड के रूप में सामने आई। इसके बाद से अब तक पांच बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। हर बार हरनौत से जदयू को जीत मिली है। फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में यहां से जदयू के सुनील कुमार जीते। वहीं, 2010, 2015 और 2020 में यहां से जदयू के हरिनारायण सिंह ने जीत दर्ज की है।