सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में दोषी की सजा में बदलाव कर दिया। शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले के मुताबिक अभियुक्त की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। जबकि उसकी शेष जीवन कारावास की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। कोर्ट ने कहा पॉक्सो की धारा 6 के तहत यह सजा सुनाई गई थी, लेकिन अपराध के वक्त यह धारा लागू नहीं थी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अपराध मई 2019 में किया गया था। जबकि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की धारा 6 का संशोधित प्रावधान 16 अगस्त 2019 को लागू हुआ था। इसलिए धारा 6 के संशोधित प्रावधान को इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता था। धारा 6 गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए दंड से संबंधित है।
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अदालत ने कहा कि 2019 के संशोधन से पहले धारा 6 में जुर्माने के साथ न्यूनतम 10 साल और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान था। पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 20(1) के तहत पूर्वव्यापी प्रभाव से कठोर दंड लगाने के खिलाफ सांविधानिक प्रतिबंध स्पष्ट और पूर्ण है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 6 में 2019 के संशोधन द्वारा पेश की गई बढ़ी हुई सजा को लागू किया था। इससे दोषी को अपराध के समय कानून के तहत स्वीकार्य सजा से अधिक सजा दी गई थी।
पीठ ने कहा कि अधिनियम के संशोधित प्रावधान के अनुसार आजीवन कारावास का अर्थ है शेष प्राकृतिक जीवन की सजा। लेकिन घटना की तारीख 20 मई, 2019 को यह सजा वैधानिक ढांचे में मौजूद नहीं थी। तब धारा 6 के तहत अधिकतम अनुमेय सजा आजीवन कारावास थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी सजा को संशोधित करते हुए उसे आजीवन कठोर कारावास की सजा देते हैं। जबकि शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास की सजा को रद्द करते हैं। कोर्ट ने कहा कि दोषी पर लगाया गया 10,000 रुपये का जुर्माना बरकरार रखा गया।
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हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दिया आदेश
शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सितंबर 2023 के आदेश के खिलाफ दाखिल दोषी की अपील पर फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दोषी की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने दोषी को जुर्माने के साथ शेष जीवन के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।